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बुधवार, 08 अगस्त, 2007 को 10:19 GMT तक के समाचार

श्याम बेनेगल को दादा साहब फाल्के पुरस्कार

मशहूर फ़िल्मकार श्याम बेनेगल को प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार के लिए चुना गया है. उन्हें वर्ष 2005 के लिए यह पुरस्कार दिया गया है.

यह पुरस्कार भारत सरकार भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए देती है.

अपने करियर की शुरूआत विज्ञापनों से करने वाले श्याम बेनेगल ने हिंदी सिनेमा में कला फ़िल्मों का ऐसा दौर शुरू किया जिनमें कल्पना के रंग कम थे और ये हक़ीक़त के बहुत क़रीब थीं.

1934 में हैदराबाद में जन्मे बेनेगल मशहूर अभिनेता, निर्माता और निर्देशक गुरु दत्त के भतीजे हैं.

नया दौर

1970 के दशक में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म 'अंकुर' बनाई और समालोचकों की जमकर प्रशंसा बटोरी.

इसके बाद 'निशांत' और 'मंथन' से उन्होंने अपने हुनर का सुबूत दिया.

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कृति 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' को 1998 में 'भारत एक खोज' के रूप में छोटे पर्दे पर साकार कर बेनेगल ने भारतीय इतिहास को घर-घर तक पहुँचाया.

सूरज का सातवाँ घोड़ा (1992) और समर (1998) के लिए भी उन्हें जमकर प्रशंसा मिली.

उन्होंने मशहूर ठुमरी गायिका 'सरदारी बेग़म' के जीवन पर भी फ़िल्म बनाई.

वर्ष 2001 में 'ज़ुबैदा' जैसी ज़ोरदार फ़िल्म बनाकर श्याम बेनेगल ने उन पर कला फ़िल्मों का ठप्पा लगाने वालों को चौंका दिया.

1969 में स्थापित दादा साहेब फ़ाल्के पुरस्कार से सम्मानित होने वाली पहली कलाकार देविका रानी थी, जबकि 2004 में मलयालम फ़िल्मों के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन को इस पुरस्कार के लिए चुना गया था.

बेनेगल पूर्व में प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों पदमश्री (1976) और पदम भूषण (1991) से सम्मानित हो चुके हैं.

एक साल पहली ही उन्हें भारतीय संसद के ऊपरी सदन सदन राज्यसभा के लिए नामांकित किया गया था.