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शनिवार, 21 जुलाई, 2007 को 08:50 GMT तक के समाचार

पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

दिल्ली में एशियाई-अरब सिनेमा समारोह

दिल्ली में इन दिनों एशियाई और अरब सिनेमा का अंतरराष्ट्रीय समारोह शुरू हो चुका है. शुक्रवार से शुरू हुआ यह समारोह 29 जुलाई तक चलेगा.

ओसियान सिनेफ़ैन की ओर से दिल्ली में एशियाई फ़िल्मों के अंतरराष्ट्रीय समारोह का यह नौंवां वर्ष है पर इस बार इसे विस्तार देकर अरब सिनेमा को भी समारोह में शामिल किया गया है.

इस दौरान दिल्ली के सिनेमा प्रेमियों और भारतीय सिनेमा से जुड़े लोगों को दुनियाभर के 35 देशों से क़रीब 140 फ़िल्में इस समारोह में देखने को मिलेंगी.

फ़िल्म समारोह की शुरुआत के लिए ईरान की फ़िल्म, रामी को चुना गया था और इसी के प्रदर्शन के साथ शुक्रवार को देर शाम इस समारोह की शुरुआत हुई.

समारोह का समापन 29 जुलाई को मिस्र की एक फ़िल्म, कट एंड पेस्ट से होगा जिसे निर्देशित किया है हाला खलील ने.

बॉलीवुड और भारतीय सिनेमा की कई नामचीन हस्तियों के अलावा इस समारोह में क़रीब 300 अंतरराष्ट्रीय अतिथि और हज़ारों की तादाद में लोग शामिल हो रहे हैं.

ख़ास आकर्षण

इस बार जो सबसे ज़्यादा आकर्षित करने वाली चीज़ें हैं, उनमें अरब सिनेमा का इस समारोह में शामिल किया जाना है.

अपने विषयों और कला पक्ष के लिए दुनियाभर में ख़ास जगह रखने वाली अरब फ़िल्मों को देखने का मौका इसबार भारतीय दर्शकों को मिलेगा.

पर सबसे ख़ास है इस बार की थीम और वो है जापान का सिनेमा. इस बार समारोह में जापान की फ़िल्मों और सिनेमा जगत से लोगों को अवगत कराने के लिए इन्हें विशेष प्रदर्शन के लिए रखा गया है.

समारोह में इस बार जापान के मशहूर फ़िल्म लेखक और समीक्षक तादाओ साटो को लाइफ़ टाइम एचीवमेंट सम्मान से सम्मानित किया गया.

दुनियाभर में अपने लेखन को लेकर जाने जाने वाले साटो सिनेमा से जुड़े विषयों पर अबतक 130 से भी ज़्यादा किताबें लिख चुके हैं.

समारोह में अतंरराष्ट्रीय सिनेमा के अलावा भारत में बन रहे वैकल्पिक सिनेमा को भी प्रदर्शित किया जा रहा है.

सिनेमा-सिनेमा

समारोह में जहाँ एक ओर सुस्त विषयों के साथ अंतरराष्ट्रीय सिनेमा जगत में अपनी पहचान तलाशता भारतीय सिनेमा होगा वहीं ईरान, लेबनान और अरब देशों से युद्ध और उसके बाद की स्थितियों, विस्थापन और युद्ध के मनोविज्ञान जैसे विषयों पर आधारित फ़िल्में इस समारोह में देखने को मिलेंगी.

साथ ही वियतनाम, मलेशिया, फ़िलिपींस, इंडोनेशिया जैसे देशों से कुछ कम बजट की प्रभावशाली फ़िल्में देखने को मिलेंगी.

इस बार एक और नई चीज़ समारोह का हिस्सा है और वह है पीवीआर जैसे बड़े सिनेमाघर समूहों को भी समारोह से जोड़ना. दिल्ली में स्थित पीवीआर के दो सिनेमाघरों में भी समारोह की फ़िल्मों को दिखाया जाएगा.

हालांकि जब बीबीसी संवाददाता ने पूछा कि क्या उन सिनेमाघरों को भी जोड़ने की तैयारी है जो दशकों से सिनेमा का केंद्र रहने के बाद अब लगभग ख़त्म होते जा रहे हैं, आयोजकों ने कहा कि अभी शुरुआत है और इस दिशा में भी सोचा जा सकता है.

बहरहाल, सिनेमा की तासीर और विषयों के दौरान सेंसरशिप की बहसों और तारीफ़ों, आलोचनाओं के साथ यह समारोह अगले कुछ दिन दिल्ली के सिने-प्रेमियों को काफी रोचक फ़िल्में देखने का मौका देगा.