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शुक्रवार, 20 जुलाई, 2007 को 10:50 GMT तक के समाचार

नरेश कात्यायन की ग़ज़लें

एक

सनम भी चश़्मेतर होने लगा है,
इबादत का असर होने लगा है.

करिश्मा जो मोहब्बत का इधर था,
वही जादू उधर होने लगा है.

उसके अफ़साने में गाहे-बगाहे,
हमारा भी ज़िकर होने लगा है.

अज़ब सा दर्द है जो मेरे दिल में,
न होता था मगर होने लगा है.

शरीक़े ज़िंदगी तो हो न पाया,
शरीके रहगुज़र होने लगा है.

मेरा दिल एक रेगिस्तान सा था,
वो आया है तो घर होने लगा है.

दो

मुझे देखकर छुपे हुए हैं घर में बड़े लजीले लोग,
रहते हैं क्या गाँव तुम्हारे शर्मीले-शर्मीले लोग.

जान बचाकर भागो, तक्षक बोला अपनी नागिन से,
घर में जनमेजय के हैं, तुझसे ज़्यादा ज़हरीले लोग.

यह वसंत के ठेकेदारों की कैसी मनमानी है,
गाँव-गाँव में तन से मन तक हैं सब पीले-पीले लोग.

चमक लग गई है आँखों में कल बुधुआ के बेटे के,
देख लिए उसने कारों पर चमकीले-चमकीले लोग.

शोषण की जोंकों ने इनका रस पहले ही चूस लिया,
सत्ता अब भी होंठ लगाकर कहती, बड़े रसीले लोग.

प्रतिभा के मजबूत करों में बेकारी है, चिंता है,
इंकलाब की ध्वजा उठाए फिरते ढीले-ढीले लोग.

कुछ दिन से मेरी बस्ती में ये अजीब पागलपन है,
गरम-गरम आँखों पर सेंकें आँचल गीले-गीले लोग.

तीन

तुझको करके तलाश देखूँगा,
फिर से होकर उदास देखूँगा.

बन के विग्रह जिया हूँ मैं सदियों,
तुझसे होकर समास देखूँगा.

जिससे डरता है हरेक व्यक्ति यहाँ,
उसका होकरके ख़ास देखूँगा.

वो मेरी प्यास के मुक़ाबिल है,
मैं समंदर की प्यास देखूँगा.

सारी दुनियाँ में तलाशा ख़ुद को,
अब तेरे आस-पास देखूँगा.

ये अंधेरा मिटे, मिटे न मिटे,
फिर भी करके प्रयास देखूँगा.

अपनी दुनिया से तेरी दुनिया में,
करके कुछ दिन प्रवास देखूँगा.

* * * * * * * * * *
नरेश कात्यायन
201, राजकीय कालॉनी,
सेक्टर-21,
इंदिरानगर, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)