मंगलवार, 10 जुलाई, 2007 को 12:41 GMT तक के समाचार
लंदन में साहित्यिक रुचि रखने वाले लोगों के लिए पिछला हफ़्ता काफ़ी कुछ ले कर आया.
सात जुलाई को प्रतिष्ठित साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा के ग़ज़ल संग्रह यह घर तुम्हारा है का विमोचन एक अलग ही ढंग से हुआ.
आलोचकों या साहित्यकारों के भाषणों के स्थान पर जानेमाने गायकों ने इस संग्रह की कुछ गज़लें गा कर समाँ बाँध दिया.
अन्य श्रोताओं और साहित्यकारों के अलावा इस कार्यक्रम में मशहूर चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन ने भी शिरकत की.
जो ग़ज़लें इस अवसर पर गाई गईं उनमें प्रमुख थी पूनम देव की गाई पुस्तक की शीर्षक गज़ल जो तुम न मानो मुझे अपना हक़ तुम्हारा है, यहाँ जो आ गया इक बार वो हमारा है.
र्कायक्रम की शुरूआत में नेहरू सेंटर की निदेशिका मोनिका मोहता ने कहा कि तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों की तरह उनकी कविताएं भी आम आदमी के मन की बात कहती हैं.
मोनिका मोहता ने टेम्स नदी पर लिखी उनकी कविता की कुछ पंक्तियां उद्धृत कीं - बाज़ार संस्कृति में नदियां नदियां ही रह जाती हैं,बनती हैं व्यापार का माध्यम, मां नहीं बन पाती हैं.
पुस्तक का विमोचन करते हुए भारतीय उच्चायोग के मंत्री समन्वय श्री रजत बागची ने तेजेन्द्र शर्मा की सकारात्मक सोच की तारीफ़ करते हुए कहा कि तेजेन्द्र की रचनाओं में ब्रिटेन पूरी शिद्दत से उभर कर सामने आता है.
उनकी कहानियों, कविताओं, गज़लों और व्यंग्यों में स्थानीय समाज पूरे तौर पर दिखाई देता है। बात चाहे ब्रिटेन की पतझड़ की हो, या फिर 10 डाउनिंग स्ट्रीट की, टेम्स नदी की हो या फिर हैरो शहर की, तेजेन्द्र उन्हें अपनी कविताओं में ले ही आते हैं.
भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी राकेश दुबे ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए कहा कि प्रवासी जीवन को लेकर तेजेन्द्र की एक सोच है जो उनके साहित्य में नज़र आती है.
तलाश का मंचन
इससे कुछ दिन पहले नाट्यकर्मी कृष्णकांत टंडन के निर्देशन में नाटक तलाश का मंचन हुआ.
केके टंडन एक अभिनेता के तौर पर पिछले काफ़ी समय से रंगमंच से जुड़े रहे हैं लेकिन उन्होंने पहली बार लेखन और निर्देशन की ज़िम्मेदारी संभाली है.
तलाश कहानी है 21वीं सदी में विवाह को लेकर लोगों के बदलते रुख़ की. इस नाटक में इस बात का बख़ूबी चित्रण है कि कैसे वैवाहिक संबंधों की गंभीरता ख़त्म होती जा रही है.
नाटक में कृष्णकांत टंडन के अलावा हिना बक्षी, अनिल देवानी, संदीप गारचा, अज़ीज़ ज़ुल्फ़िक़ार और दीपा शाह की प्रमुख भूमिकाएँ थीं और इन सभी कलाकारों ने उनके साथ न्याय किया.
नाटक को दर्शकों और समीक्षकों की भरपूर सराहना मिली.
तेजेंद्र शर्मा और कृष्णकांत टंडन में एक बात समान है और वह यह कि दोनों ही लंबे समय तक बीबीसी हिंदी से जुड़े रहे हैं.