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गुरुवार, 05 जुलाई, 2007 को 12:45 GMT तक के समाचार

एस नियाज़ी
भोपाल से

भाषा और देश की सीमा पार करती आदिवासी चित्रकला

अभावों से जूझते हुए सिर्फ़ कूची के अपने कौशल की बदौलत मध्य प्रदेश के पिछड़े इलाक़े में रहने वाले अर्धशिक्षित गोंड आदिवासी कलाकारों ने पूरी दुनिया में अपनी छाप छोड़ी है.

गोंड जनजाति के ये कलाकार भले ही विदेशी भाषा नहीं जानते हो पर इनकी चित्रकला जर्मनी, इटली, फ्रांस और ब्रिटेन में पहुँच रही है और सराही जा रही है.

मिसाल के तौर पर, मध्य प्रदेश के मंडला जिले के सुनपुरी गाँव में जन्मी दुर्गाबाई की बनाई हुई तस्वीरें एक फ्रांसीसी किताब में छापी गई हैं जिसे अनुष्का रविशंकर और श्रीरीष राव ने लिखा है.

अँगरेज़ी में बेगम रुकैया सख़ावत हुसैन के कहानी संग्रह 'सुल्तान ड्रीम' में भी दुर्गाबाई के चित्रों को देखा जा सकता है.

जर्मनी और फ्रांस की यात्रा कर चुकीं दुर्गाबाई कहती हैं, "विदेशों में लोगों को इस बात से कोई सरोकार नही है कि हम कितने पढ़े-लिखे हैं. उन्हें सिर्फ़ हमारी कला से मतलब है.″

मंडला में दीवारों पर चित्र बनाकर शुरुआत करने वाली दुर्गाबाई के चित्र आज 25-30 हज़ार रुपए में बिकते हैं. वे कहती हैं, ″विदेशों में किसी भी चित्र की क़ीमत भारत से कही ज्यादा मिलती है."

जंगल बुक

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एक अन्य गोंड कलाकार हैं भज्जू श्याम, भज्जू की तस्वीरों का एक संकलन 'द लंदन जंगलबुक′ के नाम से इटैलियन डच, फ्रेंच और अँगरेज़ी में प्रकाशित की जा चुकी है. इसकी अब तक तीस हज़ार से भी ज्यादा प्रतियां बेची जा चुकी हैं.

इस किताब के लिए भज्जू को 'इंडिपेंडेंट पब्लिशर अवार्ड' भी मिल चुका है.

भज्जू मानते है कि "गोंड चित्रों के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है. जितनी माँग बढ़ेगी कलाकारों को भी उतना ही फायदा होगा."

कुछ वर्ष लंदन के एक रेस्तराँ ने भज्जू को बुलवाकर अपनी दीवारों पर उनसे पेंटिंग्स बनवाई थीं.

भज्जू श्याम की ही तरह उनके रिश्तेदार वेंकट श्याम भी गोंड चित्रों को विदेशों में लेकर कई विदेश यात्राएँ कर चुके हैं. उनके चित्रों की प्रर्दशनी स्पेन में लग चुकी है. यूरोप में उनके चित्रों को काफी पसंद किया जाता है.

भोपाल में मज़दूरी करने वाले राम सिंह उरवेती को ये याद नही है कि वो अब तक कितनी पेटिंग बना चुके है. मगर उनकी पेटिंग अब दुनिया भर में देखी जा सकती है.

वे कहते हैं, "विदेशों में गोंड कला को अब स्थान मिलने लगा है. लोग इसके लिए अब ऊँची क़ीमत देने को तैयार है."

मगर गोंड चित्रकला को ये स्थान दिलाया जनगण श्याम ने. उन्होंने 2001 में जापान में आत्महत्या कर ली. उनकी पत्नी ननकुसिया भी अब अपने पति के काम को आगे बढ़ाना चाहती हैं.

ननकुसिया कहती हैं, "जनगण चित्रकला के माध्यम से आदिवासी संस्कति को पूरे देश में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में पहचान दिलाना चाहते थे.″

मध्य प्रदेश सरकार के जनजाति प्रकाशन विभाग के प्रबंध निदेशक श्रीराम तिवारी का कहना है कि सरकार इस साल के अंत तक जर्मनी में इन कलाकारों की एक प्रर्दशनी लगाना चाहती है ताकि ये विदेशों में अपनी पहुँच बढ़ा सकें.