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शुक्रवार, 29 जून, 2007 को 23:10 GMT तक के समाचार

ओम गुप्ता
दिल्ली से

नाटक में सब चलता है

इन दिनों रंगमंच पर दिखाए जाने वाले नाटकों के विषय और भाषा को देखने-सुनने से एहसास होता है कि फ़िल्मों और टेलीविज़न के मुक़ाबले थिएटर ज़्यादा दबंग, बेबाक और आज़ाद है.

उदाहरण के लिए पीटर शैफ़र के नाटक 'इक्वस' में एक किशोर और एक घोड़े की प्रेमकथा को बड़े ही खुलेपन से दिखाया गया.

लेकिन न देखते हुए और न ही बाद में इसे लेकर कोई हंगामा हुआ. इसके विपरीत ब्रिटेन में हैरी पॉटर की भूमिका करने वाले अभिनेता डैनियल रैडक्लिफ़ ने जब इसी नाटक पर बनी फ़िल्म में काम किया हैरी को चाहने वाले बौखला उठे.

'इक्वस' का उदाहरण अपवाद नहीं है. शैक्सपियर का नाटक 'ओथेलो' सदियों से भारत में दिखाया जाता रहा है.

दर्शकों ने उसे महान नाटक माना पर जब उस पर बनी फ़िल्म 'ओमकारा' अपनी तमाम गालियों समेत पर्दे पर आई तो मध्यमवर्गीय महिला दर्शकों को बेचैनी होने लगी और कई तो इंटरवल में ही फ़िल्म छोड़कर चली गईं.

ये दोनों उदाहरण भले ही अंग्रेज़ी नाटकों के अनुवादों के हों लेकिन ऐसे मूल हिंदी नाटकों की भी कमी नहीं है जिन्होंने हर सामाजिक रिश्ते की बखिया उधेड़ कर रख दी है.

कुछ नमूने पेश हैं.

बहस

सुरेंद्र वर्मा के नाटक 'सूर्य की अंतिम किरण से पहली किरण तक' में एक राजा वंश आगे न बढ़ा पाने की वजह से अपनी पत्नी को पर पुरुष के पास भेज देता है.

नियोग नाम से मशहूर इस परंपरा पर पूरे नाटक में खुलकर बहस होती है.

महेश एलकुंचवार के मराठी नाटक 'वासनाकांड' में भाई-बहन का वर्जित रिश्ता दिखाया गया है.

दो हज़ार साल पहले लिखी गई 'इडिपस' श्रृंखला में नियति बेटे की शादी माँ से करा देती है. यह नाटक पिछले दिनों हिंदी में फिर खेला गया.

अक्सर यह सवाल पैदा होता है कि क्या समाज ने नाटककारों और निर्देशकों के लिए अलग पैमाना बना रखा है. इस बारे में लेखकों, निर्देशकों और समाजशास्त्रियों ने अलग-अलग राय रखी.

जाने माने उपन्यासकार गंगाप्रसाद विमल ने नाटयशास्त्र लिखने वाले भरतमुनि का हवाला देते हुए कहा,‘‘रंगमंच पर सामाजिक वर्जना दिखाई जा सकती है, आचरण की वर्जना नहीं. इसका मतलब है समाज जिन चीज़ों की इजाज़त नहीं देता उन्हें रंगमंच पर दिखाया जा सकता है लेकिन धर्म या क़ानून को तोड़ने वाला कोई काम सही नहीं ठहराया जा सकता.’’

वैसे अनेक नाटकों में भरत-मुनि को भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया है. उदाहरण के लिए ‘द्रौपदी’ नामक नाटक में एक स्त्री को चार मर्दों से एक ही समय में रिश्ता निभाते हुए दिखाया गया है.

इस पर जानी मानी नाट्य समीक्षक कविता नागपाल का कहना है, "नाटक का काम स्थापित मान्यताओं को तोड़ना है. नाटक या ड्रामा शब्द में ही चौंकाना शामिल है और उसका निशाना अक्सर मध्यवर्ग ही होता है".

एक अन्य लेखक हिमांशु जोशी का भी यही मानना है कि देखने वाले इतने कम होते हैं कि नाटक से कभी किसी क्रांति की उम्मीद नहीं की जाती. अंधेरे बंद कमरे में सोचने समझने वाले कुछ लोगों के सामने अभिनेता चीख़-चिल्लाकर सोए लोगों को जगाने का काम करते हैं.

पर मजे की बात यह है कि अब कुछ हद तक यह काम टीवी सीरियल भी करने लगे हैं. एकता कपूर के तमाम धारावाहिक परिवार की जड़ों पर चोट कर रहे हैं. रिश्तों का खोखलापन उजागर कर रहे हैं.

क्या कभी ऐसा फ़िल्मों में भी मुमकिन हो पाएगा?

जनसंचार विशेषज्ञ सुभाष सूद कहते हैं,"ऐसा कभी नहीं होगा. फ़िल्मों को देखने वाले ढेर सारे होते हैं. उनकी सोच भी एक नहीं होती पर नाटक के दर्शक दिमागी तौर पर जुड़े होते हैं. बेहतर तजुर्बे के लिए तैयार हो कर आते हैं."

नाटक समीक्षक मोहन कृष्ण तिक्कु ने बहस को आख़िरी छोर तक ले जाते हुए कहा कि नाटक कुछ ख़ास लोगों द्वारा, कुछ ख़ास मुद्दों पर, कुछ ख़ास के लिए खेला जाता है. मकसद बहस छेड़ना और बढ़ाना होता है.