शुक्रवार, 29 जून, 2007 को 10:35 GMT तक के समाचार
तीर्थयात्रा में
पैदल अपने पड़ोस जा रहा हूँ.
इस तरह जाना क्या यात्रा नहीं है.
बहुत दूर चले जाना ही यात्रा है
जो मैं अब कर नहीं सकता.
घर से निकल नहीं सका तीन दिन
अब पड़ोस के घर जा रहा हूँ
दो कदम ही चला हूँ-
घर से दूर,
मैं यात्रा में हूँ
तीर्थयात्रा में.
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सब संख्यक
लोगों और जगहों में
मैं छूटता रहा
कभी थोड़ा कभी बहुत
और छूटा रहकर
रहा आता रहा.
मैं हृदय में जैसे अपनी ही जेब में
एक इकाई सा मनुष्य
झुकने से जैसे जब से
सिक्का गिर जाता है
हृदय से मनुष्यता गिर जाती है
सिर उठाकर
मैं बहुजातीय नहीं
सब जातीय
बहुसंख्यक नहीं
सब संख्यक होकर
एक मनुष्य
खर्च होना चाहता हूँ
एक मुश्त.
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अचानक मार
बिलासपुर के पास
अचान कमार का जंगल है
शहरी आदत से अचानक मार हो गया.
जंगल में आदिवासी बैगा की एक झोपड़ी दिखी-
एक झोपड़ी का गाँव जैसी झोपड़ी.
झोपड़ी की मिट्टी की दीवाल पर
छुही मिट्टी और गेरू से पेड़ बने हैं
कि जंगल में कम हैं.
दीवाल पर पक्षी भी बने हैं
जंगल में तब भी कम होंगे.
अंदर की एक दीवाल पर
शेर का चित्र है
कि जंगल में एक भी नहीं.
तथा दीवाल पर एक झोपड़ी का भी चित्र है
एक पड़ोसी झोपड़ी
एक झोपड़ी का पड़ोस
कि एक भी पड़ोसी नहीं-
अचानक मार से
शायद अचानक मर गया जंगल
और बिलासपुर शहर में रोज़ी-रोटी के लिए
बैगा आदिवासी लोगों का एक मुहल्ला बस गया है.
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विनोद कुमार शुक्ल
217, शैलेंद्र नगर,
रायपुर, छत्तीसगढ़. 492 001