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शुक्रवार, 27 अप्रैल, 2007 को 06:47 GMT तक के समाचार

महेश 'अश्क' की गज़लें

न मेरा जिस्म कहीं औ' न मेरी जाँ रख दे
मेरा पसीना जहाँ है, मुझे वहाँ रख दे

बगूला बन के भटकता फिरूँगा मैं कब तक
यक़ीन रख कि न रख, मुझमे कुछ गुमाँ रख दे

बिदक भी जाते हैं, कुछ लोग भिड़ भी जाते हैं
प' इसके डर से, कोई आईना कहाँ रख दे

वो रात है, कि अगर आदमी के बस में हो
चिराग़ दिल को करे और मकाँ-मकाँ रख दे

जो अनकहा है अभी तक, वो कहके देखा जाए
ख़मोशियों के दहन में, कोई ज़ुबाँ रख दे

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अब तक का इतिहास यही है, उगते हैं कट जाते हैं
हम जितना होते हैं अक्सर, उससे भी घट जाते हैं

तुम्हें तो अपनी धुन रहती है, सफ़र-सफ़र, मंज़िल-मंज़िल
हम रस्ते के पेड़ हैं लेकिन, धूल में हम अट जाते हैं

लोगों की पहचान तो आख़िर, लोगों से ही होती है
कहाँ किसी के साथ किसी के बाज़ू-चौखट जाते हैं

हम में क्या-क्या पठार हैं, परबत हैं और खाई है
मगर अचानक होता है कुछ और यह सब घट जाते हैं

अपने-अपने हथियारों की दिशा तो कर ली जाए ठीक
वरना वार कहीं होता है, लोग कहीं कट जाते हैं

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यहीं एक प्यास थी, जो खो गई है
नदी यह सुन के पागल हो गई है

जो हरदम घर को घर रखती थी मुझमें
वो आँख अब शहर जैसी हो गई है

हवा गुज़री तो है जेहनों से लेकिन
जहाँ चाहा है आँधी बो गई है

दिया किस ताक़ में है, यह न सोचो
कहीं तो रोशनी कुछ खो गई है

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महेश अश्क,
'आज' हिंदी दैनिक,
बैंक रोड,
गोरखपुर-273001