शनिवार, 31 मार्च, 2007 को 21:55 GMT तक के समाचार
दुर्गेश उपाध्याय
बीबीसी संवाददाता, मुंबई
दुनिया की इस सबसे बड़ी फ़िल्म इंडस्ट्री में भी अब कई बदलाव हो रहे हैं.
अब फिल्म निर्माण की दुनिया से जुड़े लोग इसके व्यावसायिक पक्ष को पूरी तरजीह दे रहे हैं. धीरे धीरे कई कार्पोरेट समूह भी अब इस धंधे में हाथ आज़माने उतर रहे हैं.
ज़ाहिर है, भारत में सिनेमा का बाज़ार हज़ारों करोड़ रूपए का है और बड़ी कंपनियों को इस ख़ज़ाने में सेंध मारने के फ़ायदे समझ में आ गए हैं.
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि बॉलीवुड का निगमीकरण इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाने, बेहतर निवेश, धन के बेहतर उपयोग, पाइरेसी पर रोक के साथ ही बड़े पैमाने पर होने वाले राजस्व के नुक़सान को समाप्त कर पाने में मददगार साबित होगा.
ग़ौरतलब है कि अब फिल्मों को लेकर लोगों का रूझान काफी हद तक बदला है. दर्शक अब व्यावहारिक सिनेमा की तरफ आकृष्ट हो रहा है.
ऐसे में फ़िल्म बनाने वाले लोगों के लिए ये ज़रुरी हो गया है कि वो ऐसी फिल्में बनाएँ जो हर वर्ग के लिए हों.
मिसाल के तौर पर मझोले बज़ट की फिल्म 'खोसला का घोसला' बॉलीवुड के निगमीकरण का अच्छा उदाहरण पेश करती है.
फिल्म की कहानी साधारण थी. कोई बड़े कलाकार नहीं और न ही बड़ा बजट लेकिन यूटीवी ने फ़िल्म को ऐसे प्रोमोट किया कि फ़िल्म ने अच्छा व्यवसाय किया.
पैसे की कमी नहीं
फिल्म निर्माण के धंधे में आज जो बड़े-बड़े कार्पोरेट समूह हैं उनमें अनिल अंबानी की ऐडलैब्स, आदित्य बिड़ला ग्रुप का एप्लॉज इंटरटेनमेंट, यूटीवी वगैरह शामिल हैं.
यूटीवी के कार्यकारी उपाध्यक्ष सिद्धार्थ रॉय कपूर कहते हैं कि इस क्षेत्र में कार्पोरेट घरानों का आना अच्छा संकेत है.
वे कहते हैं, '' उनके पास इस इंडस्ट्री को बेहतर बनाने के लिए अच्छे विचार हैं. साथ ही इन विचारों पर अमल करने को लेकर एक बेहतर समझ और पर्याप्त पैसा है. इन औद्योगिक घरानों के आने के बाद फिल्म निर्माण की सारी प्रक्रिया नियमित और आसान हो जाएगी,साथ ही कम समय में बेहतर उत्पाद मिल सकेगा.''
जिस तरह से किसी भी कारोबार को सही ढंग से चलाने के लिए दूरदर्शिता और पर्याप्त वित्तीय मदद की ज़रुरत होती है,ठीक उसी तरह से अब ये कंपनियाँ फिल्म निर्माण में अपनी नीतियों का इस्तेमाल कर रही हैं.
'यूएफओ मूवीज़' जैसी कंपनियाँ फ़िल्मों के साधारण प्रिंट को अब डिजिटल प्रिंट में बदलकर पाइरेसी को रोकने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं.
एहतियात ज़रूरी
तो क्या निगमीकरण के ज़रिए फ़िल्म इंडस्ट्री के कामकाज को बेहतर बनाने की कोशिश काफी है.
डर ये भी है कि तमाम अत्याधुनिक संसाधनों से लैस कंपनियों का प्रबंधन फिल्म निर्माण के ताने-बाने को समझ पाएगा या नहीं.
फ़िल्म व्यवसाय को समझने वाली इंदु मीरानी का कहना है, ''फ़िल्म निर्माण एक रचनात्मक कारोबार है और देखने वाली बात यह होगी कि कार्पोरेट घराने का पूरा ध्यान कहीं फ़िल्म की मार्केटिंग, वितरण और विज्ञापन तक ही सीमित न रह जाए. उन्हें फ़िल्मों के लिए एक अदद कहानी तलाशने की तरफ भी ध्यान देना होगा क्योंकि आख़िर में दर्शकों को चाहिए एक अच्छी और मनोरंजक फिल्म."
फिल्म निर्माण में कार्पोरेट समूहों के शामिल होने से ज़ाहिर है कि इंडस्ट्री के काम करने के तरीके में बदलाव तो आ रहा है लेकिन देखने वाली बात ये होगी कि ये बदलाव इंडस्ट्री के लिए कितना कारगर हो साबित हो पाएगा.