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गुरुवार, 22 मार्च, 2007 को 16:30 GMT तक के समाचार

लीलाधर मंडलोई की कविताएँ

एक

मैं दिल्ली में हूँ और मेरा मन कहीं
कहाँ हूँ मैं और ये ज़िंदगी मेरी
कि जैसे रेशा-रेशा बिखरने को यहाँ

किससे कहूँ?
दोस्त वो कौन हो कि जो आधी रात को
तवज्जो दे कि मैं कितनी तकलीफ़ में सचमुच
ये कैसा डर मैं ऐसा सोचता हूँ
कि मेरे इस तरह बेवक़्त फ़ोन करने से
कहीं ख़त्म न हो बची-खुची दुआ सलाम

फिर भी उठाता हूँ फ़ोन कि इतना बेबस
और घुमाता हूँ जो भी नंबर
वह दिल्ली का नहीं होता.

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दो
इस भूल-भूलइया से बाहर निकलो
ये दायरों का दिलचस्प तिलिस्म है
इस स्क्रीन के भीतर
ज्यों बैठा है कुंडली मारे
तुम्हारा ईमान बन चुका है

दायरों में बाँट के तुम्हारी हस्ती
काट दिया है उस जादूगर ने
हवा से, धूप-पानी से
अब तुम भूल गए हो कि
ज़मीन कितनी बसोअ है

जिस्म तुम्हारा कुम्हलाता है अब
धूल-मिट्टी से
तुम कितने ख़फ़ा हो
चाँद-सूरज से
और नातेदारों से

इस तिलिस्म को तोड़े बिना
तुम बाहर आ नहीं सकते

इस तिलिस्म की कुँजी
कहीं खो गई है तुम्हारे भीतर
उसे खोजोः इसे खोलो
ये कायनात बाहर कितनी अजीम है
कितनी रोशनी कितनी हसीन

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तीन

छोटी बात नहीं हैं ये
न कोई छोटा क़िस्सा

ये शक-ओ-सुब्हा
ये चेहरे बेरौनक
ये बंद दरवाज़े
ये धुआँ-धुआँ
ये चीख़-ओ-पुकार
ये तबाही

छोटी बात नहीं हैं ये
ये अख़बार नहीं
बिके हुए गुलाम हैं

ये सच कब बोलते हैं???

*****

चार

फ़िजाओं में खुश्बू का मेला
रंगीनियाँ बिखरी हुई है
बाज़ार सज-धज के खड़े
हवाओं में नगमें रोशन

बच्चों के लिए आज तो
दिन है मौज मस्ती का

माँ कहती है लेकिन
आज घर के बाहर न निकलना

आज त्यौहार का दिन है
आज माँ घबराई हुई है

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लीलाधर मंडलोई
ए-2492
नेताजी नगर
नई दिल्ली-23