शुक्रवार, 16 मार्च, 2007 को 06:40 GMT तक के समाचार
शतदल के गीत
एक
कल अचानक गुनगुनाते चीड़वन जलने लगे
और उसके पाँव से लिपटी नदी बहती रही!
है नदी के पास भी अपनी सुलगती पीर है
दोपहर की धूप में जलते पहाड़ों पर,
आग झरते जंगलों की गोद में तकदीर है
कौन सुनता है किसी का दर्द इस माहौल में
पर नदी कल-कल विकल अपनी कथा कहती रही!
धूप के अपने कथानक भी यहाँ पर हैं बड़े
क्या करें सब विवश होकर थरथराते बाँचते
ये सुहाने वृक्ष ऊँचे पर्वतों पर जो खड़े
क्षीण-काया, अग्निवीणा पर छिड़े संगीत का
भीड़ थर-थर कॉपती सहती रही!
और फिर भी यह नदी बहती रही.
कल अचानक गुनगुनाते चीड़वन जलने लगे
और उनके पाँव से लिपटी नदी बहती रही.
*****
दो
एक सपना दिए का जिएँ;
हम अंधेरा समय का पिएँ;
दीप बोलो, हृदय में धरो!
हर दिशा में, उजाला करो!
दीप की बात इतनी सुनो;
रोशनी के दुशाले बुनो;
एक पल के लिए ही सही-
दिन गिनो, रात को भी गुनो;
ज़िंदगी के अंधेरे हरो!
हर दिशा में उजाला करो!
दीप बोलो, हृदय में धरो!
ज्योति अपनी कथाएँ कहे;
वह किसी रूप में भी रहे;
रोशनी का यही धर्म है-
हर गली, गाँव-घर में बहे;
दीप के पर्व इतना करो!
आज घर-घर उजाला भरो!
दीप बोलो, हृदय में धरो!
दीप ने गीत ऐसा लिखा;
वह मिला तो सभी कुछ दिखा;
भूमिका दीप की है कठिन
तुम करो तो सही एक दिन
बस यही भूमिकाएँ करो!
हर दिशा में उजाला करो!
दीप बोलो, हृदय में धरो!
***************
शतदल
द्वारा श्री सत्य प्रकाश शुक्ल
111-ए/59, अशोक नगर
कानपुर-208012