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गुरुवार, 08 मार्च, 2007 को 13:31 GMT तक के समाचार

सुरेश ऋतुपर्ण की कविताएँ

जापान में पतझर

निक्को के पर्वत-शिखरों पर
ठहर गई है अक्तूबर की धूप
घाटी की हरियाली पर
बैठी हैं अनगिनत तितलियाँ
उड़ना भूल!

तैल-रंगों सी छायाएँ उन की
झील में पड़ी हैं छिटकी
आतुर आकाश ने
लेने को जिन्हें समेट
जल की सतह पर फैलाए हैं
बादलों के सफ़ेद काग़ज़
और फिर
पेड़ों की छाया में
बिछा दिए हैं सूखने के लिए

निक्को के पतझर ने आज
कराया एक नया अहसास
भूल है समझना
वसंत के पास ही है
रंगों का एकाधिकार
पतझर ने भी पाया है
प्रकृति-माँ से
रंगों का उत्तराधिकार!

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बरसात

चलती है हवा तो हो जाती है बरसात
पानी की बूंदों की तरह
पत्तियों पर पत्तियाँ झर रही हैं
चुपचाप!

थर-थर काँपती घाटी
बेसुध हो, झील में
नहा रही है
पानी से उठती धुँध ने पर
ढक दी है उसकी लाज!

चलती है हवा तो सिहर उठता है
सिल्क के रंगीन दुपट्टे की तरह
नदी का जाल!

आसमान पर छाए हैं
उचक्के चोर बादल
नदी में उतर जो
जल्दी-जल्दी भर रहे हैं
अपने सफ़ेद झोलों में
बेशुमार रंग!

बसंती फूलों पर
मरने वालों को कौन समझाए,
पतझरी पत्तियों की नश्वरता में
छिपी है कैसी अमरता!

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वसंत

वसंत से वसंत की राह में
एक पड़ाव है पतझर
राही ऋतु-चक्र थक कर
सुस्ताता है जहाँ पलभर
वसंत के लालच में
जिसने ठुकराया पतझर
जीवन उसका निष्फल
वंचनाभर!

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सुरेश ऋतुपर्ण
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