गुरुवार, 01 मार्च, 2007 को 19:45 GMT तक के समाचार
अशोक चक्रधर
वरिष्ठ साहित्यकार
भारत में इन दिनों मुख्य रूप से दो प्रकार के कवि हैं- एक पुस्तक वाले, दूसरे उस तक वाले. पुस्तक वाले, उस तक यानी श्रोता तक नहीं जाते और उस तक वाले पुस्तकों से कोई खास सरोकार नहीं रखते.
अपन ने सोचा कि इस असंभव गैप को भरा जाए, पुस्तक से लेकर उस तक के कवियों को होली पर कुछ रचनाशील बनाया जाए. चक्रधर-च मन में बुलाया जाए और कुछ आचमन कराया जाए.
होली का मौक़ा है, अपने-अपने मन की भड़ांस निकालें और दिलों में धंसी फांस निकालें. तन-मन रंगने के बाद एक-दूसरे पर संगीन आरोप लगाने के बजाय रंगीन-रंगीन कविताएं लिखें.
रंगीन कविताएं लिखने के लिए रंगीन प्रेरणा भी तो चाहिए. कहा जाता है कि धरती पर सुन्दरतम सृष्टि स्त्री है और स्त्रियों की मलिका आजकल, मल्लिका सहरावत मानी जाती है, तो सोचा उन्हीं को बुलाया जाए.
उसतक के और पुस्तक के, दोनों प्रकार के कवियों को काव्य-लेखन के लिए प्रेरित किया जाए. कलह, कोलाहल और अल्कोलाहल की जगह भवन में भव्य भंग का सेवन हो, भावनाओं का लेवन-देवन हो.
कवियों के नाम पर मल्लिका पहले तो घबरा गईं, लेकिन जब मैंने बताया कि तुम्हारी भाभी का जन्मदिन भी है तो झट से तैयार हो गईं.
मैंने पूछा- बाई द वे बताना कि कवियों से क्यों घबराती हो? तो बोली- 'पूरे कपड़े पहन कर आना पड़ेगा न, सब के सब ओल्डी-ओल्डी होंगे.'
मैंने कहा- 'हे मल्लिके! दिल छल्लिके! क्या तुम्हें मालूम नहीं कि खटोला न कभी मूढ़ा होता है और कवि न कभी बूढ़ा होता है.'
तुम अनुमान भी नहीं लगा सकतीं कि तुम्हारे ऊपर कितने खंड काव्य, महाकाव्य जन्म ले सकते हैं.
बस आ जाओ. कॉस्ट्यूम्ज़ मध्य काल के पहनकर आना. वो खुश हो गई- 'ओके फाइन.'
ओम प्रकाश आदित्य
फोन मिलाया ओम प्रकाश आदित्य को. वे बोले- ' अपने चमन में बुला रहा है, आचमन भी करा रहा है, पर धन कितना दिला रहा है.' मैंने कहा- धन नहीं है, गुलबदन है.
मल्लिका सहरावत के रूप में, कविता की प्रेरणा. उसे देखकर एक कविता भी लिख गई तो साल भर कमाओगे-खाओगे'. उन्होंने मेरी पूरी बात सुने बिना एक कवित्त मेरे मोबाइल में सरका दिया-
होली पे बुला रहा है, झोली मेरी खाली है रे,
इतना बता दे मुझे, दक्षिणा क्या पाऊंगा?
फोकट में यदि मैंने, आना-जाना शुरू किया,
खाली बटुआ ले के मैं, क्लब कैसे जाऊंगा?
होली कवियों के लिए फसल कटाई सी है,
तेरे कहने पे नहीं, दाने बिखराऊंगा.
मल्ल को न मल्लिका का लालच दिखा भतीजे,
इस उम्र में न अब सेहरा बधाऊंगा.
मैंने कहा- 'सहरावत सेहरा बांधने नहीं आ रही है, आपको प्रेरित करने आ रही है, आ जाइए. चचे!
मेरा मंतव्य ये है कि उस तक वाले कवि और पुस्तक वाले कवि, दोनों का मिलान करा दूं. होली मिलन का त्यौहार है.
अशोक वाजपेयी
अब फोन घुमाया अशोक वाजपेयी को- ' जी होली पर एक प्रोग्राम रखा है, भंग-तरंग हो जाए'.
वे बोले- ' मैं तो भारत भवन में बुलाता था कलाकारों को. भारत भवन में तो अब हूं नहीं. जैसी होली मैं कराता था वैसी तुम करा ही नहीं सकते'.
मैंने कहा- 'आप चक्रधर-चमन को भारत भवन समझिए. मैं आपको आजीवन ट्रस्टी बना देता हूँ यहां से आपको कोई हिला नहीं सकता है.' आजीवन ट्रस्टीशिप का प्रस्ताव सुन कर वे एकदम तैयार हो गए.
सारी चर्चाएं एक तरफ, मल्लिका सहरावत का नाम एक तरफ. चक्रधर चमन का न्योता सबने स्वीकार किया. कैसा जीना, और क्या मरना, उस रूप का वर्णन क्या करना! धूपबत्ती की तरह सबको सुलगाती हुई, सबके अंदर से कविता का धुआं उठाती हुई वह कल्पना-परी आई.
सबसे पहली कविता अशोक वाजपेयी ने ही सुनाई-
सहरावत मुझे सिखाओ
कैसे बन जाते हैं घाव और
एक अदृश्य फांस कसकती रहती है जीवन भर
सहरावत मुझे बताओ
कैसे जब सब भूल चुके होंगे
तुम्हें जीवन व्यापार में
मैं याद रख सकूँ
और महसूस कर सकूँ
दूसरों से बेहतर
सहरावत मुझे सुझाओ
कि कैसे मैं तुम्हारी रोशनी बचाएं रखूँ
तेल चुक जाने के बाद भी
ताकि तुम्हें एक महंगी किताब की तरह
एक रात में ही पूरी पढ़ सकूँ.
कुँवर बेचैन
कुँवर बेचैन अपने शोधार्थियों की सुविधा के लिए अशोक वाजपेयी की कविता के नोट्स ले रहे थे. बीच-बीच में दूसरे फुलस्केप काग़ज़ पर सहरावत को देख-देख कर गोल-गोल रेखाओं में चिड़िया सी बना रहे थे. उन्होंने सस्वर सुनाया-
देह सहरावत बनी तो
नेह में संदेह होगा!
देह को सौंदर्य सींचे
और सबकी दृष्टि खींचे
दीखती हो देह सम्मुख
आंख खोले, आंख मींचे
देह के बिन प्यार कैसा
प्यार, बिन अभिसार कैसा
और प्रेयसि मल्लिके को
देह का श्रृंगार कैसा?
नीरज
नीरज जी अशोक वाजपेयी को समझा रहे हैं- ' कुंवर बेचैन ने मल्लिका को प्रेयसि कहा, ये ठीक नहीं है. प्राचीन साहित्य में प्रेयसि शब्द कहीं नहीं मिलेगा. वहां स्त्री को कहा जाता था कामिनी. काम के बिना कुछ नहीं है.'
संस्कृत साहित्य में प्रेम शब्द बहुत कम मिलता है. प्रेम के स्थान पर काम मिलता है. काम के कारण ही संसार चल रहा है. सहरावत में प्रेम न देखो, सहज काम देखो. सब वही देखते हैं.
अशोक वाजपेयी ने नीरज जी से उनकी उम्र पूछी. उत्तर मिला- ' अभी तिरासीवें वर्ष में प्रवेश किया है'. उन्होंने भी अपना गीत सुना डाला-
वर्ष तिरासी हृदय तलैया
शांत शीत से जल में भैया
लहरों की हलचल होती है.
शायद ऐसी आंधी आवे
जिसमें दिवस रात हो जावे
सहरावत( यानी रेगिस्तान के समान)
इस मरुस्थली में
कामिनि निज धीरज खोती है
लहरों की हलचल होती है.
कन्हैया लाल नंदन
कन्हैया लाल नंदन बोले- ' लहरों की हलचल नहीं हुई, क्या हुआ मुझसे सुनिए.
यह सब कुछ मेरी आंखों के सामने हुआ.'
आसमान से सहरावत उतरी
उस पर टंके हुए
ख्वाबों के सलमे सितारे
बिखरे
देखते-देखते सब कुछ
उतर गया ख्वाब में
और मैं पीला पड़ गया.
शैल चतुर्वेदी
शैल चतुर्वेदी बोले- पीले मत पड़िए, नीले रंग की पनीली कविता सुन लीजिए-
हमने सहरावत को
बगल में बिठा कर ड्राइवर से कहा-
आज गाड़ी हम चलाएंगे
ड्राइवर बोला-
हम उतर जाएंगे!
हुज़ूर चला कर तो देखिए
आपकी आत्मा हिल जाएगी,
ये सहरावत है
सरकार नहीं है
जो भगवान के भरोसे चल जाएगी.
चक्रधर चमन में आचमन चल रहा है, घुलन-मिलनशील कविताएं चल रही हैं. आप भी आ जाइए, देर क्यों लगाते हैं, मिल कर कोई गीत गुनगुनाते हैं.