शुक्रवार, 23 फ़रवरी, 2007 को 06:53 GMT तक के समाचार
गुनगुनी धूप है
गुनगुनी धूप है
गुनगुनी छाँह है.
एक तन एक मन
एक वातावरण,
प्यार की गंध का
जादुई व्याकरण,
मन में जागी मिलन की
अमिट चाह है.
नींद में हम मिलें
स्वप्न में हम मिलें
ज़िंदगी की हरेक
साँस में हम खिलें
हमको जग की नहीं
आज परवाह है.
चिट्ठियाँ जो लिखीं
संधियाँ जो रचीं
तुम मिले जब से
बेचैनियाँ हैं जगी
कल्पना में पगी
प्यार की राह है.
दो घड़ी बैठ कर
दो घड़ी बोल कर
तुम गए साँस में
छंद-सा घोल कर
सिंफनी नींद है
चंपई ख्वाब है.
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छुआ मुझे तुमने रूमाल की तरह
थके हुए काँधे पर
भाल की तरह,
छुआ मुझे तुमने रूमाल की तरह.
फिर चंचल चैत की
हवाएँ बहकीं,
कुम्हलाए मन की
फुलबगिया महकी
उमड़ उठा अंतर शैवाल की तरह.
बीत गए दिन उन्मन
बतकहियों के
लौटे फिर पल
कोमल गलबहियों के
हो आया मन नदिया-ताल की तरह.
बहुत दिन हुए
तुमसे कुछ कहे हुए
सुख-दुख की संगत में
यों रहे हुए
बोले-बतियाए चौपाल की तरह.
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एक साँस गंध नदी सी
कौन भला गूँथ गया
जूड़े में फूल
सिहर उठा माथ हल्दिया.
एक साँस गंध नदी सी
लहरों सा गुनगुना बदन
बात-बात पर हँसना रूठना
हीरे सा पिघल उठे मन
किसने छू लिया भला
रेशमिया तन
सिहर उठा हाथ मेंहदिया.
एक प्यार सोन पिरामिड सा
और बदन परछाईं सा
जल तरंग जैसे बजता है
मन मेरा पुरवाई सा
किससे ये लाज-शरम
कुछ तो बोलो...
सिहर उठा गात क्यों प्रिया?
एक आस गरम धूप सी
बाहों में ऐसे दहके
जूही बगिया में कोई
रह-रह के जैसे महके
किसने झाँका चुपके
घूँघट की ओट
दमक उठा प्रात सीपिया.
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ओम निश्चल
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