शुक्रवार, 23 फ़रवरी, 2007 को 07:30 GMT तक के समाचार
देवेंद्र इस्सर
कहानी
‘‘समावार में और कोयले डाल दूं?’’ बूढ़े सरायवाले ने कहा.
हमने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया.
‘‘इस वर्ष खूब सर्दी पड़ेगी.’’
‘‘हाँ, लक्षण तो कुछ ऐसे ही हैं. दिसंबर के दूसरे सप्ताह ही बर्फ़ गिरनी शुरू हो गई.’’
‘‘पिछले वर्ष तो क्रिसमस पर पहले दिन बर्फ़ पड़ी थी.’’
‘‘तुम क्रिसमस पर यहीं थे?’’
‘‘हाँ, क्यों?’’
‘‘मैं भी यहाँ था. मुलाक़ात नहीं हुई.’’
‘‘मैं तो हर वर्ष आता हूँ सर्दियों में बर्फ़ गिरने का दृश्य देखने. कभी-कभी मुझे यों महसूस होता है कि बर्फ़ में दूर तक चलते चलें, कोहरे डूबे हुए जब पहचाने हुए चेहरे भी अजनबी दिखाई दें और अजनबी चेहरे पास से गुज़रें तो आभास हो कि ये वही चेहरे हैं जिन्हें तुम वर्षों से जानते हो.’’
‘‘गुलाम, बेगम, बादशाह एक रंग के.’’
‘‘इधर तीन इक्के हैं.’’
‘‘उठा लो.’’
उसने पैसे समेट लिए और मेज़पोश का कोना उठाकर उसके नीचे रख दिए. ताश के पत्ते फिर बँटने लगे. समावार में पानी गर्म हो रहा था. भाव के सफ़ेद-सफ़ेद बादल उभरने लगे. आतशदान में एक लकड़ी और डाल दी गई. बाहर बर्फ़ अभी तक पड़ रही थी.
‘‘तो तुम हर वर्ष क्रिसमस में यहाँ आते हो.’’
‘‘सुना है, क्रिसमस का दिन सबसे अच्छा दिन होता है. इस दिन अकेले एक कोने में इस दूरदराज़ सराय में बैठकर कहवा पीने में बड़ा आनंद आता है. बाहर बर्फ़ गिर रही होती है और आदमी अपने से एक लंबी मुलाक़ात कर सकता है जो शायद वह वर्ष भर नहीं करता- दूसरे चेहरे, दूसरे लोग, दूसरी बातें जैसे तुम कुछ भी नहीं हो. सिफ़र भी नहीं. तुम्हारा कोई चेहरा नहीं, तुम्हारा कोई दिल नहीं, तुम्हारा कोई दोस्त नहीं...’’
‘‘आज बिजली बड़े ज़ोरों से चमक रही है.’’
‘‘मुझे बिजली के चमकने से बड़ा डर लगता है.’’
‘‘पहाड़ी स्टेशनों पर तो बिजली प्रायः चमकती है. बादल खूब गरजते हैं.’’
‘‘लेकिन कभी-कभी आदमी डर के निकट होना चाहता है. यह देखने के लिए कि उसके चेहरे के रंग कैसे बदलते हैं.’’
‘‘इसीलिए तुम्हें शिकार पसंद है.’’
उसने सिर हिला दिया और पाइप सुलगाने लगा. सराय का मालिक कहवे के तीन प्याले मेज़ पर रख गया. कहवे की सुनहरी रंगत से भाप की सफ़ेदी उठती हुई मन को बड़ा आनंद देती है. लकड़ी के चटखने की आवाज़ बड़ी भली मालूम होती है और आग के शोलों के कारण सामने पुरानी धुआँ खाई दीवार पर परछाइयाँ परस्पर टकरा सी जाती हैं.
‘‘तुम चुप क्यों हो गए?’’
‘‘सोचता हूँ, वह कौन सी वस्तु है जो हमें हर वर्ष ही इस निर्जन स्थान पर ले आती है. सर्दी में सब पक्षी अपने-अपने नीड़ छोड़कर गर्म स्थानों में चले जाते हैं और यहाँ के निवासी भी मैदानों में चल जाते हैं और हम...’’
‘‘शायद हम पर किसी अभिशाप का प्रभाव है’’ तीसरा व्यक्ति बोला.
‘‘हर आदमी को अपना घर छोड़ना पड़ता है, आदम और ईव से लेकर हम सब तक’’ मैंने कहा.
‘‘स्वर्ग छोड़कर हम सब इस संसार में निरंतर भटक रहे हैं.’’
‘‘निरंतर भटकना मनुष्य का भाग्य है.’’
‘‘तुम भाग्य पर विश्वास करते हो?’’
‘‘हर आदमी भाग्य पर विश्वास करता है, तुम नहीं करते?’’
वह मौन रहा.
‘‘तुम हर वर्ष यहाँ क्यों आते हो? किसी खोज में आते हो? तुम्हें भाग्य ही खींच लाता है.
‘‘शायद.’’
‘‘तुम कहते हो कि तुमने कई बार कोशिश की कि तुम इस वर्ष यहाँ नहीं आओगे. लेकिन ज्यों ही तुम्हें पता चलता है कि बर्फ़ गिरनी शुरू हो गई है, तुम्हारे शरीर में जैसे लावे की गर्मी तैरने लगती है और तुम्हें ख़बर ही नहीं होती कि तुम इस सराय में हो.’’
‘‘यह भाग्य नहीं.’’
‘‘तो और क्या है?’’
वह चुप हो गया. ताश के पत्ते उसके हाथ में काँपने लगे. उसने कहवे का एक घूंट पिया और उसने साथियों की ओर देखा और फिर पत्तों को एक-दूसरे से बदलने लगा. कमरे में निस्तब्धता छा गई. केवल लकड़ी के जलने की आवाज़ थी या समावार में पानी खौलने की. उसने अपनी कुर्सी आतशदान के निकट सरका ली.
‘‘आज मैंने मिस फ्रीडा को देखा है.’’ तीसरा व्यक्ति बोल उठा.
‘‘कहाँ?’’ मैंने पूछा.
रिज पर. वह अकेली ही जा रही थी.
‘‘यह मिस फ्रीडा सर्दियों में कही चली क्यों नहीं जाती. डांस स्कूल तो बंद हो जाता है और टूरिस्ट भी नहीं होते, कारोबार बड़ा मंदा होता है.’’
‘‘सुना है, उसका अपने स्कूल के मालिक से कई बार झगड़ा हो चुका है.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘वह चाहता है कि जिससे वह चाहे फ्रीडा उसके साथ डांस करे, उसके साथ शराब पिए, उसके साथ घूमे और...’’
‘‘तो इसमें क्या है! आख़िर वह दूसरे के साथ भी तो घूमती फिरती है.’’
‘‘वह कहती है कि मैं स्कूल से बाहर स्वतंत्र हूँ. जहाँ चाहूँ घूमूं, जिससे चाहूँ मिलूं. तुमने कभी उसके साथ डांस किया है?’’
‘‘नहीं’’
‘‘उसके साथ डांस करते हुए महसूस होता है कि तुम इंद्रधनुष पर झूल रहे हो. उसके बदन की महक, रंग और आँच तुम्हें मदहोश-सा बना देती है.’’
‘‘तुम किसका ज़िक्र कर रहो हो? फ्रीडा का’’ आतशदान के निकट से उठकर वह वापस मेज़ पर आ गया.
‘‘तीन वर्ष हुए, एक रात वह इस सराय में आई थी.’’ उसने कहा.
‘‘इस सराय में’’
‘‘उसने हल्के लाल और पीले फूलोंवाला स्कर्ट पहन रखा था. उसके बाल हवा में लहरा रहे थे. उसके गले में नॉयलान का नीला स्कार्फ़ था, जिस पर रोम के गिरजाघरों के चित्र अंकित थे. उसका चेहरा बर्फ़ की तरह सफ़ेद था. इस अर्ध-अंधेरे में शोलों के सामने खड़ी वह बड़ी सुंदर प्रतीत हो रही थी. वह बहुत पिए हुए थी.’’
‘‘फिर क्या हुआ?’’
‘‘मैं उसे कुर्सी पर बिठा दिया. इसी कुर्सी पर जिस पर तुम बैठे हो. वह कुर्सी की बैक पर सिर टेककर बैठ गई. मैं उसके ऊपर झुक सा गया. मैंने पूछा- मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूँ?’’
उसने अपनी आँखें खोलीं, मेरी ओर देखा और मुस्करा दी.’’ तुम क्या सहायता कर सकते हो?’’
‘‘कुछ भी.’’
‘‘मेरे शरीर को मत छूना.’’ उसने कहा और आँखे बंद कर लीं. मैं उसके सामने कुर्सी पर बैठ गया. उसने अपने हैंडबैग से व्हिस्की की शीशी निकाली और उसे होंठों से लगा लिया. मैंने उसके हाथों से शीशी छीन लेनी चाही. वह पहले ही बहुत पिए हुए थी.
उसने मेरा हाथ झटक दिया-‘‘तुमने वायदा किया है, तुम मेरे शरीर को नहीं छुओगो’’ मैं वापस कुर्सी पर बैठ गया. वह उसी तरह कुर्सी पर सिर टिकाए अर्ध लेटी सी रही और फिर सो गई. मैंने अपना ओवरकोट उस पर डाल दिया. मुझे नींद आ रही थी. मिस फ्रीडा से यह मेरी पहली मुलाक़ात थी.’’
मैं उसकी बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था.
सरायवाला प्यालों में और कहवा डाल गया.
जब वह सुबह उठी तो उसने अंगड़ाई ली, चारों ओर देखा-‘‘मैं कहाँ हूँ?’’
‘‘सराय में.’’
‘‘कोन सी सराय? औह, दैट डर्टी लिटल इन?’’
‘‘तुम ठीक हो न? मैंने पूछा.
‘‘तुम कौन हो?’’ उसने पूछा.
‘‘मैं कौन हूँ? इससे क्या अंतर पड़ता है!’’
‘‘वह एक क्षण के लिए मौन रही.’’ उसने अपना स्कार्फ़ ढीला किया.
उसके बालों का पीला फूल फ़र्श पर आ गिरा.
‘‘तुम यह पीला फूल क्यों लगाती हो?’’
‘‘आज पहली बार लगाया है. न जाने क्यों मन चाहा.’’ उसने मेरी ओर देखा- बर्फ़ पड़ने से पीले फूल प्रायः सफ़ेद हो जाते हैं.’’ उसने कहा और आँखें बंद कर लीं.
‘‘आज भी उसने फूल लगाया था.’’ तीसरा आदमी बोला.
‘‘मैं तुम्हें कैसी लगती हूँ.’’ फ्रीडा ने अनायास पूछा.
‘‘बड़ी सुंदर, आकर्षक और...’’मैंने कहा.
‘‘और क्या? ’’
जो मेरे मन में था, मैं कह न सका. वह मुस्करा सी दी.
‘‘यदि तुमने वायदा न किया होता कि मेरे शरीर को नहीं छुओगे तो मुझे मदहोश पाकर तुम क्या करते?’’ उसने पूछा. मेरे पास उसका कोई उत्तर नहीं था. शायद वह उत्तर चाहती भी नहीं थी.
‘‘यदि मैं नीलाम होना चाहूँ तो मेरी क़ीमत क्या होगी? मेरा अभिप्राय है, जब तक मैं ज़िंदा हूँ...अच्छा छोड़ो. यदि तुम ख़रीदना चाहो तो क्या दोगे? शायद तुम्हारे पास इतने पैसे नहीं. तुम एक रात का क्या दोगे?’’ वह निरंतर बोले जा रही थी.
‘‘मैं तुम्हें ख़रीद नहीं सकता, मैडम. मनुष्य का कोई मूल्य नहीं.’’
‘‘यू डैम हिपोक्रेट!’’
‘‘नहीं.’’
‘‘तुमने कभी प्यार नहीं किया.’’
‘‘नहीं. शायद तुमने भी कभी प्यार नहीं किया.’’
वह बोली, ‘‘कोई भी किसी से प्यार नहीं करता. सब अपनी कल्पना से प्यार करते हैं. और जब उनका भ्रम टूट जाता है तो वे निराश हो जाते हैं. कुछ बेवफ़ा हो जाते हैं, कुछ आत्महत्या कर लेते हैं, कुछ दूसरों से विवाह कर लेते हैं.’’
‘‘प्यार न कल्पना से होता है न शरीर से, बल्कि पूर्ण व्यक्ति से, शरीर से, मन से, आत्मा से...’’
‘‘यह आत्मा क्या होती है? पुस्तकों में इसका बड़ा ज़िक्र आता है’’ वह बोली.
‘‘शरीर ही सत्य है. शरीर से परे कोई सत्य नहीं.’’
‘‘फ़र्श पर उसके पाँव थिरकने लगे और वह फूल की तरह खिल कर उठ बैठी. वह हल्के-हल्के सुरों में गा रही थी.’’
‘‘तीन मौन दृश्य
गिरती हुई बर्फ़
ऊषा से पूर्व का क्षण
उसका चेहरा
जिसकी मृत्यु अभी हुई है!’’
‘‘गाते-गाते उसके क़दम सहसा रूक गए-गिरती हुई बर्फ़, ऊषा से पूर्व का क्षण, उसका चेहरा जिसकी मृत्यु अभी हुई है-वह धीरे-धीरे कह रही थी. उसका चेहरा बिल्कुल सफ़ेद हो गया और वह निष्प्राण सी कुर्सी पर बैठ गई.’’
उसने फ़र्श से पीला फूल उठाया और बालों में लगा लिया. मैंने कहवे का प्याला बनाकार उसे दिया. वह ख़ामोशी से कहवा पीती रही और उठकर चली गई. बाहर बर्फ़ गिर रही थी और पौ फटने वाली थी. मैंने खिड़की से देखा वह धीरे-धीरे जा रही थी.
‘‘उस शाम को मैंने देखा, फिर वही मिस फ्रीडा थी. वही डांस स्कूल, वहीं बाहों के दायरे और आलिंगन की गुलाइयाँ और शराब में डूबे हुए शरीर...’’
उसने ताश को मेज़ पर रखते हुए कहा और कहवे का एक घूंट पिया. आतशदान में आग धीमी पड़ चुकी थी. समावार में पानी खौल-खौलकर ख़मोश हो चुका था. बूढा सरायवाला अपनी चारपाई पर ऊँघ रहा था. हवा के झौंकों से लैंप हिल रहा था और हमारी परछाइयाँ फ़र्श और दीवार पर काँप रही थीं. सहसा खिड़की खुली और तेज़ झौंके से ताश के पत्ते मेज़ और फ़र्श पर इधर-उधर बिखर गए. बूढ़े सरायवाले ने दो-एक क्षण के लिए आँखें खोलीं और फिर लिहाफ़ मुँह पर ओढ़कर सो गया. मैंने लपककर खिड़की बंद कर दी. चीड़ के पेड़ों से गुज़रती हुई वायु का शोर अब भी कमरे में आ रहा था.
‘‘तुमने कहा है कि मिस फ्रीडा ने पीला फूल लगा रखा था? ’’उसने अनायास ही पूछा.
‘‘हाँ’’ तीसरे व्यक्ति ने ऊंघते हुए कहा.
बिजली के चमकने से कमरे में एक बारगी प्रकाश का सागर उमड़ आया और दूसरे क्षण ही सिमट गया. उसने पाइप सुलगाया और आराम कुर्सी पर बैठ गया. वह काफ़ी देर तक पाइप पीता रहा. इस दौरान मुझे नींद आ गई.
अभी सुबह नहीं हुई थी. सरायवाला मेरे सिरहाने खड़ा मुझे जगा रहा था-‘‘साहब, गज़ब हो गया! वह साहब, जो हर वर्ष यहाँ आते थे, अचानक न जाने कहाँ चले गए! बाहर तूफ़ान है साहब!’’
मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा. सामने चारपाई पर देखा, वह नहीं था. उसका पाइप सिरहाने रखे मेज पर पड़ा था. मैंने जल्दी-जल्दी कोट पहना और बाहर की ओर दौड़ा.
बर्फ़ निरंतर गिर रही थी. पौ अभी फटने ही वाली थी. सड़क बहुत ग्लेन की ओर जा रही थी. इस सड़क पर वह प्रायः घूमने जाया करता था. काफ़ी दूर जाने पर मुझे किसी की शक्ल दिखाई दी. मैंने जल्दी से उसके निकट पहुँचा. वह वहीं था. वह एक ठिठुरे हुए आदमी की तरह निस्तब्ध खड़ा नीचे देख रहा था. सहसा मेरी दृष्टि नीचे पड़ी. मैं सहम गया-सड़क पर बर्फ़ में ढकी मिस फ्रीजा की लाश पड़ी थी.
बर्फ़ गिरने से पीला फूल सफ़ेद हो गया था और उस पर मौत की नीली शिराएँ उभर आई थीं.
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देवेंद्र इस्सर
बी-3/153
जनकपुरी
नई दिल्ली-110058