गुरुवार, 01 फ़रवरी, 2007 को 23:43 GMT तक के समाचार
एक
नए साल की उफ!
कितनी तस्वीर घिनौनी है
वही सभी शतरंज खिलाड़ी
वही पियादे हैं
यहाँ हलफनामों में भी
सब झूठे वादे हैं
अपनी मूरत से मुखिया की
मूरत बौनी है
गेहूँ की बाली पर बैठा
सुआ अकेला है
कहा सुनी की मुद्राएं हैं
दिन सौतेला है
फिर अफवाहों से ही
अपनी आँखमिचौनी है
आँगन में बँटकर
तुलसी का बिरवा मुरझाया
मझली भाभी का दरपन सा
चेहरा धुँधलाया
मछली सी आँखों में
टूटी एक बरौनी है
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दो
कोई गीत लिखा मौसम ने
आज तुम्हारे नाम
हरे-भरे खेतों में सरसों के
लहराते फूल
बहके-बहके पाँव हवा के
कदम-कदम पे भूल
कई दिनों के बाद चीरकर
कोहरा निकला घाम
अरसे बाद गाँव से आई
चिट्ठी खोल रहा
बनकर होंठ गुलाबी
हर इक अक्षर बोल रहा
बहुत दिनों के बाद आज
हम फिर होंगे बदनाम
सुधियों के जकड़े-अनजकड़े
बंधन टूट रहे
हलद पुते हाथों से
पीले कंगन छूट रहे
तेरी आहट से उदासियाँ
हुईं आज नीलाम
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तीन
मन ही मन खामोश
कबूतर कुछ बतियाता है
बंद लिफाफे लेकर
अब डाकिया न आता है
क्या इस युग में हम
इतने निष्ठुर हो जाएंगे
अंतरंग बातें यंत्रों से
हम बतियाएंगे
कोई बनकर अतिथि नहीं
अब आता जाता है
सांझ ढले माँ के चौके
अब धुआँ नहीं होता
गागर में सागर क्या
पनघट कुआँ नहीं होता
कोई बच्चा अब न
तितलियों को दौड़ाता है
चाँद-सितारों की छाया में
सोना कहाँ गया
फूलों की घाटी में
मन का खोना कहाँ गया
अब न सगुन के समय
कोई भंवरा मँडराता है.
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जयकृष्ण राय तुषार
63-जी, बेली कॉलोनी
स्टैनली रोड, इलाहाबाद