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रविवार, 14 जनवरी, 2007 को 10:15 GMT तक के समाचार

लोकगीत मेरे गुरु हैं- पद्मा सचदेव

जम्मू से 40 किलोमीटर दूर शिवालिक की पहाड़ियों और गुप्त गंगा देविका के किनारे एक छोटा सा गाँव है पुरमंडल. इसी गाँव में पद्मा सचदेव छह-सात साल की उम्र में देवी की भेंटे गाने लगी थी.

फिर आई लोकगीतों की बारी और और आठ-नौ बरस की जब हुईं तो डोगरी लोकगीतों में छंद जोड़ना कर दिया था.

14-15 साल की उम्र में उनकी कविताएँ प्रकाशित होने लगीं और रेडियो-स्टेशन पर पद्मा सचदेव जाना-पहचाना नाम बन चुका था.

आज पद्मश्री से लेकर साहित्य अकादमी पुरस्कार तक अनेक पुरस्कार पद्मा सचदेव के नाम लिखे हुए हैं. पद्मा सचदेव की कविता सुनकर ही कवि दिनकर ने कहा था, “जो बात पद्मा कहती हैं, वही असली कविता है. हम में से हर कवि उस कविता से दूर, बहुत दूर हो गया है.’’

डोगरी की कवियत्री पद्मा सचदेव से रत्ना कौशिक ने लंबी बात की. इस बातचीत के प्रमुख अंश -

कविता की सृजन प्रक्रिया के बारे में कुछ बताइए?

‘‘टूट जाते हैं कभी मेरे कनारे मुझ में
डूब जाता है कभी मुझमें समन्दर मेरा.’’

जब कविता आती है तो आप ऐसा ही महसूस करते हैं. कविता का आना फागुन का आना होता है. जैसे आपका महबूब आपको अकेले देखकर आता है वैसे ही कविता भी. अकसर कविता लिखने के बाद मैं शीशे में स्वयं को देखती हूँ. सोचती हूँ-क्या मैं ज़्यादा सुंदर हो गई हूँ? क्या ज़मीन से ऊपर उठ गई हूँ? क्या आसमान में उड़ने लगी हूँ?

संक्षेप में कहूँ तो एक ख़ास लम्हें में कविता का जन्म होता है.

डोगरी के लोकगीतों का आपके जीवन पर गहरा प्रभाव है. आपने इन गीतों को अपनी कविता में कैसे ग्रहण किया?

ये लोक गीत मेरे गुरु रहे हैं. इनकी डोर पकड़ कर ही मैं आसमान में उड़ी हूँ. जैसे गुरु की विद्या शिष्य को सहज ही मिल जाती है वैसे ही लोकगीतों की तर्ज़ मेरे लेखन में चली आई.

क्या आप मानती हैं कि हिंदी का विकास उसकी बोलियों - डोगरी, पंजाबी, ब्रज, अवधी, बुंदेलखंडी, भोजपुरी, मैथिली आदि के विकास से जुड़ा है?

मैं समझती हूँ कि हिंदी एक बहुत विशाल, गहरा और अथाह सरोवर है. ये भाषाएँ उसकी सहायक नदियाँ हैं. अगर यह सरोवर अपनी सहायक नदियों से जुड़ा न रहे तो उसके सूखने का खतरा पैदा हो सकता है. भारत को अगर आगे बढ़ना है तो उसे अपनी सभी बोलियों और भाषाओं को आगे बढ़ाना होगा.

हिंदी की किताबें छपती नहीं. छपती हैं तो पढ़ी नहीं जाती. इस विषय पर आप क्या कहना चाहेंगी?

हिंदी की इस स्थिति के लिए हम ख़ुद जिम्मेदार हैं. हम किताबें न तो पढ़ते हैं और न खरीदते हैं. हिंदी को हम देते कम उससे लेते ज़्यादा हैं. लेखकों का ध्यान भी पुरस्कारों और विदेश यात्राओं पर ज़्यादा है, हिंदी की प्रगति पर कम. अंग्रेज़ी हम पर थोप दी गई है. यह सच है कि अंग्रेज़ी ने हमें बहुत कुछ सिखाया है पर पहले माँ फिर मौसी का स्थान है. हमें और हमारी नई पीढ़ी को यह सच जान लेना चाहिए.

क्या आपका लेखन कभी पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच आया?

जब पारिवारिक जिम्मेदारियाँ आईं तब मैंने कविता को चाय के प्यालों में बह जाने दिया.

आपने अपनी आत्म-कथा ‘बूंद-बावड़ी’ में लिखा है,‘‘स्त्रियाँ आदर भी कहाँ माँगती हैं. हम तो कहती हैं कि हमारा अपमान मत करो.’’ इस कथन के पीछे दर्द की कौन सी परत छिपी है?

दर्द तो और भी बहुत हैं
कुछ यादों के दर्द
कुछ भेदों के
जो न रखे जाते हैं
न फेंके जाते हैं
कुछ आज के दर्द
कुछ कल के
पर एक दर्द और भी है
जो खनकता नहीं
सिर्फ होता है
ये दर्द उस दुख का है
जो मैं तुम्हें नहीं बताती.

आपके हिसाब से आपकी सबसे बड़ी खूबी क्या है?

लफ़्जों की ताकत

और कमी?

लोगों पर आसानी से विश्वास कर लेना.

क्या आप अपनी साहित्यिक यात्रा से संतुष्ट हैं?

मेरी इस साहित्यिक यात्रा ने मुझे बहुत कुछ दिया है. मैं बहुत खुश हूँ. इसकी वजह से मुझे जीवन में धर्मवीर भारती जैसे भाई मिले, जिन्होंने हाथ पकड़कर मुझसे हिंदी में गद्य लिखवाया. इस्मत चुगताई, लता मंगेशकर, पुष्पा भारती, शीला झुनझुनवाला, कमला सिंधवी जैसे प्यारे मित्र मिले. कभी-कभी मुझे लगता है कि जो रास्ता अनचीन्हा था उसके आगे विधाता स्वयं लालटेन लेकर चलते रहे.