रविवार, 14 जनवरी, 2007 को 12:44 GMT तक के समाचार
लिसा माइकल
श्रीलंका
पिछले वर्ष बुकर पुरस्कार जीतने वाली लेखिका किरण देसाई का कहना है कि लिखने के लिए विशेष माहौल की ज़रूरत होती है और कभी-कभी तो ऐसी स्थिति होती है कि वे महीनों तक कुछ भी लिखने में असमर्थ होती हैं.
इन दिनों वे एक समारोह में शिरकत करने के लिए श्रीलंका में हैं.
बुकर पुरस्कार से सम्मानित किए जाए वाली किरण ये खिताब जीतने वाली अब तक की सबसे कम उम्र की लेखिका हैं.
उन्हें उपन्यास 'द इनहैरिटेंस ऑफ़ लॉस' के लिए बुकर मिला था.
किरण को वैसे तो लेखन विरासत में मिला है लेकिन उनकी माँ अनिता देसाई नहीं चाहती थीं कि बेटी लेखिका बनने के चक्कर में अपना करियर दाव पर लगए.
लेकिन किरण को अपनी माँ के पदचिह्नों पर चलने में काफ़ी आनंद आता था.
किरण कहती हैं, "लिखने के लिए जब वह दरवाज़ा बंद कर हमें बाहर कर देती थीं, वह उस समय काफ़ी संतुष्ट नज़र आती थीं तो मुझे लगता था कुछ न कुछ तो इसमें ख़ास बात ज़रूर है".
भारत से लगाव
किरण का परिवार कोई बीस वर्ष पहले भारत से लंदन आ गया था. वहाँ से फिर यह परिवार अमरीका चला गया.
किरण का पहला उपन्यास 'हलाबलू इन द ग्वावा ऑरचर्ड’ भारतीय विषयों पर केंद्रित था.
किरण इस बारे में बताती हैं, "मुझे लगता था कि भारत से संबंधित उन यादों को सुरक्षित करना चाहिए जिनसे मेरा बेहद लगाव है.
वहीं 'द इनहैरिटेंस ऑफ़ लॉस' हिमालय के तराई के एक गाँव कलिंग पांग के लोगों पर केंद्रित है जहाँ से रोटी की तलाश में लोग अमरीका पहुँचते हैं.
हालाँकि कलिंग पांग गाँव के लोगों ने किरण पर यह आरोप लगाया था कि उन्होंने उनके गाँव का मुनासिब चित्रण नहीं किया है.
किरण कहती हैं "इस संबंध में मुझे बड़ी संख्या में ईमेल मिले. मैं उनकी प्रतिक्रिया को समझ नहीं पाई".
किरण को 'द इनहैरिटेंस ऑफ़ लॉस' को पूरा करने में सात वर्ष लगे. किरण कहती हैं कि वे इतना लंबा समय नहीं लेना चाहती थी क्योंकि एक चीज़ पर इतनी देर तक काम करने से आप कुछ अजीब से हो जाते हैं.
किरण जल्दबाज़ी में लिखने पर विश्वास नहीं करतीं. उनका मानना है कि उपन्यास लिखने के लिए एक विशेष माहौल की ज़रूरत है.
तो क्या अगले उपन्यास के लिए और सात साल इंतज़ार करना पड़ेगा?
किरण कहती हैं की "अभी मेरे पास जो माहौल है उससे अलग माहौल की ज़रूरत है. कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि मैं पूरा साल कुछ भी नहीं कर पाती."