शुक्रवार, 05 जनवरी, 2007 को 10:28 GMT तक के समाचार
कविता
बचो
विषधर चौक के
इस विकराल विस्तार को समझो
और बचो इस शहर से
यहाँ सारी सड़कें, अपने समूचे कोहराम
और चमचमाते ताम-झाम के साथ
दनदनाती घुस रही हैं तुम्हारे घरों में
तुम्हारे एकांत की चिंदियाँ बिखेरतीं
इन सड़कों की असलियत
सिर्फ़ ताक़त है
सिर्फ़ ताक़तवरों को एक दूसरे के निकट लातीं
इन सड़कों पर चलकर
कोई कभी नहीं पहुँचता अपने घर
अगर अपने घर जाना है
तो इन सड़कों से बचो
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शामुका के लिए एक कविता
नवजात की नींद में लरजते सपनों की ओर
ले चलो
ले चलो उसकी बेआवाज़ खिलखिल के
नन्हें अधरों से लिपटते विस्मय में
वहीं मिलेगी कामना की नर्म धूप में नहाती
वह गुमशुदा साँवरी
उसी कोमल किसलय के बाजू से
पूजा के दिए की लौ की उजास में
तुम फिर से देख पाओगे
अपनी बूढ़ी आँखों में काँपती सुबह
यक़ीन के इस आदिम अनाकार में
आज की बर्बर रफ़्तार के बावजूद
तुम बार-बार लौटोगे स्मृति की गलियों में
और जब अकस्मात् दौड़ते लहू की पुकार पर
दौड़ोगे अपने खेल के मैदान में
तो पथराते अंगों की अचलता में
अवतरित होगी वही गुमशुदा साँवरी
दौड़ेगी तुम्हारे साथ
अपने हाथ में तुम्हारा हाथ लिए
दौड़ेगी और दौड़ाएगी तुम्हें
इहलोक के घमासान से
उस लोक के सुनसान तक
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पानी-1
पानी के बारे में सोचो
तो याद आते हैं जितने भी दृश्य
उनसे नहीं मिटती प्यास
बल्कि और खरी हो जाती है
बेचैनी में पसीना-पसीना होती है कल्पना
और प्यास पुकारती है रोम-रोम से
रात के तीसरे पहर के खाली घड़े में
पेंदे से लगी तलछट भी नहीं
पर पानी की सोच में
जाने कितने असंभव जलविम्बों की कतार
माथे से टपकती बूँद से लेकर
समुद्र की पछाड़ खाती लहरों तक
अविरल तृषा की इस पुकार में
चिड़ियों को दाने
और बच्चों को गुड़धानी की प्रार्थना
सूख कर बन चुकी है रेत
और अपनी प्यास के नसीब में तो
रेत पर औंधा पड़ा
एक खाली घड़ा है.
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पानी-2
काली कोलतार की सड़क पर
जेठ की तपिश में चप्पलें घसीटते
जब पहुँचा टट्टे के टपरे पर
तो बाँस के स्टैंड पर
टीन की तुरतुरी से
गिलट के मग्गे में पानी पिलाती
औरत का हाथ और गिलट के कंगन
गटगट की आवाज़ में राहत की साँस लेने
और भर पेट पानी पीने के बाद
सोच की रफ़्तार में महज पसीने की चिपचिप
पानी के ख़याल की इस तस्वीर में
एक सच यह भी
इस बेचैन दिमाग में
दिन-रात सुलगती सी
क्या इसी को कहते हैं बड़वानल
क्या लिखूँ इसके बारे में
खाली दिन के एकाकी बिस्तर पर
यह किसका घर
जहाँ अनगिन जलस्रोतों के बीच
जलती रहती है कोई आग
निरंतर
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प्रभात त्रिपाठी
रामगुड़ी पारा
रायगढ़, छत्तीसगढ़ - 496 001