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गुरुवार, 28 दिसंबर, 2006 को 18:37 GMT तक के समाचार

मोनिका चड्ढा
बीबीसी संवाददाता, मुंबई

बॉलीवुड के लिए बेहतरीन रहा 2006

बॉलीवुड के लिए वर्ष 2006 काफ़ी फ़ायदेमंद साबित हुआ है.

दिलचस्प बात ये भी है कि जो फ़िल्में कामयाब हुई हैं वह बॉलीवुड के फ़ार्मूले से हटकर हैं.

इस वर्ष की सफलतम फ़िल्मों में 'रंग दे बसंती' शामिल है जो लीक से हटकर बनाई गई फ़िल्म थी.

इस फ़िल्म में युवकों की देशभक्ति और राजनेताओं के नकारात्मक रवैए पर प्रकाश डाला गया है.

इसके अलावा 'लगे रहो मुन्ना भाई' भी काफ़ी कामयाब रही. इस फ़िल्म में समाज में झूठ और बुराई से लोहा लेने का गांधीगिरी का तरीक़ा बताया गया है.

ऋतिक रोशन की फ़िल्म 'कृष' के अलावा 'धूम 2' और आमिर ख़ान और काजोल की फ़िल्म फ़ना भी कामयाब रही.

इस साल छोटे बजट की फ़िल्मों में सबसे कामयाब फ़िल्म 'खोसला का घोसला' रही. इस फ़िल्म में मध्य वर्ग के एक शरीफ़ व्यक्ति की ज़मीन माफ़िया से टक्कर होती है.

अब निर्देशकों की कोशिश यही है कि वह फ़िल्मों में कुछ नई चीज़ें शामिल करें.

बॉलीवुड पर पैनी निगाह रखने वाले कोमल नाहटा भी कहते हैं कि निर्देशकों को अच्छी स्क्रिप्ट का अंदाज़ा हो गया है. अब इन्हें पता चल गया है कि अच्छी फिल्म की बुनियाद अच्छी स्क्रिप्ट है.

कृष के निर्माता राकेश रोशन कहते हैं कि मल्टीप्लेक्सों के निर्माण का असर भी फिल्मों पर पड़ा है.

उनका कहना है कि मल्टीस्क्रीन सिनेमाघरों की वजह से शिक्षित लोग सिनेमा में फ़िल्में देखने वापस आने लगे हैं.

भारत में फ़िल्मों की माँग के अलावा विदेशों में भी इन फ़िल्मों की काफ़ी मांग है. इंग्लैंड और अमरीका में सामान्य तौर पर फ़िल्में अच्छा लाभ कमा लेती हैं.

इसकी सबसे बड़ी मिसाल शाहरुख़ खान की 'कभी अलविदा न कहना' है जो कि भारत में ज़्यादा कारोबार न कर सकी लेकिन विदेशों में हिट रही.

इन फ़िल्मों की कामयाबी की एक वजह यह भी है कि विदेशों में फिल्मों के टिकट काफ़ी महंगे हैं.

बॉलीवुड को यह भी एहसास हो गया है कि अब फ़िल्मों को फ्रेंचाइज़ करने से भी पैसा कमाया जा सकता है.

फ़िल्मों के वीडियो गेम, कपड़े, फोन के रिंग टोन और फिल्मों की क्लिप बेचने से भी काफ़ी आमदनी होती है.

फ़िल्म पत्रकार इंदु मीरानी का कहना है कि वर्ष 2006 की फ़िल्मों की कामयाबी से यह साबित हो गया है कि अब फ़िल्म निर्माता दर्शकों की मांग को समझ चुके हैं इस लिए अब वह छोटे बजट पर अच्छी स्क्रिप्ट की फ़िल्में बनाने लगें हैं.

इन तमाम कामयाबियों से लगता है कि 2007 का साल भी बॉलीवुड के लिए फ़ायदेमंद ही रहेगा.