रविवार, 24 दिसंबर, 2006 को 12:05 GMT तक के समाचार
वेदिका त्रिपाठी
मुंबई से
फ़िल्म ‘तेरे मेरे सपने’ से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत करने वाले अरशद वारसी यानी 'सर्किट' को अपनी पहचान बनाने में एक लंबा वक़्त लगा लेकिन आज किस्मत इनके साथ है.
फ़िल्म इंडस्ट्री का लगभग हर निर्माता-निर्देशक अरशद को अपनी फ़िल्म में लेने के लिए बेकरार है.
कई फ़िल्मों में अरशद ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया है. अदाकारी के साथ-साथ अरशद वारसी ने 'लगे रहो मुन्नाभाई' फ़िल्म में गाना भी गाया. गाना सुपर हिट रहा.
कई लोगों का तो यहाँ तक मानना है कि अरशद के फ़िल्म में रहने से दूसरे कलाकार को ज़्यादा अहमियत नहीं मिल पाती है.
हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘काबुल एक्सप्रेस’ में जॉन अब्राहम से कहीं ज़्यादा दर्शकों ने अरशद वारसी को पसंद किया.
इस फ़िल्म के बारे में अपने अनुभव बताते हुए अरशद कहते हैं, “मैं सिर्फ अपने काम पर ध्यान दे रहा था. वहाँ का मौसम काफ़ी ख़राब था और सिक्यूरिटी ज़्यादा होने की वजह से थोड़ी मुश्किल ज़रूर हुई थी. अगर आप शाकाहारी हैं तो वहाँ पर खाने को लेकर बड़ी परेशानी है. लेकिन कुल मिलाकर हम सबने काफ़ी मज़े से काम किया.”
फ़िलहाल अरशद के पास ‘गोल’, ‘ज़मानत’, ‘धमाल’, ‘मि. ब्लैक एंड मि. व्हाइट’, ‘रोकड़ा’ जैसी कई फ़िल्में हैं.
अरशद कहते हैं, “मेरे ख़याल से मैं बहुत ही खुशनसीब हूँ कि लोगों को मेरा काम पसंद आ रहा है और निर्देशक मुझे अपनी फ़िल्मों के लिए चुन रहे हैं.”
'काबुल एक्सप्रेस' की शूटिंग के दौरान टीम को धमकियाँ भी मिली थी. तो क्या इन्हें डर नहीं लगा.
इस पर अरशद कहते हैं, “मुझे कभी भी इस बात से डर नहीं लगा कि हम कौन सी जगह पर शूटिंग के लिए जा रहे हैं क्योंकि ये ज़िम्मेदारी तो निर्देशक की होती है कि वो हमारी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखे.”
अरशद को सिर्फ़ अपने काम से मतलब होता है और वो इन चीज़ों को नहीं मानते कि फ़िल्म रीमेक है या फिर सिक्वेल.
वो कहते हैं, “अगर काबुल एक्सप्रेस की भी सिक्वेल बनी तो मैं ज़रूर करना चाहूँगा. मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मैं किसी सिक्वेल या रीमेक में काम कर रहा हूँ.”
पत्रकारिता
वे मानते हैं कि फ़िल्म ‘काबुल एक्सप्रेस’ में काम करने का उनका अनुभव बहुत अच्छा रहा और पत्रकारिता के बारे में इन्हें कई चीज़ें और जानने को मिलीं.
अरशद ने बताया, “पहले भी मैं पत्रकारिता क्षेत्र की बहुत इज़्ज़त करता था लेकिन इस फ़िल्म के बाद इज़्ज़त और बढ़ गई है.”
वे कहते हैं, “मेरे ख़याल से यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी वजह से लोगों को इतना ज्ञान होता है और देश-दुनिया के बारे में जानकारी मिलती है."
फ़िल्म में अपनी पत्रकारिता का अनुभव बताते-बताते अरशद जोश में कहते हैं, “पहले मैं सोचता था कि जो सामने दिखाई देता है वही सच होता है लेकिन इसके बाद एक और बात पता चली कि राजनीतिक दबाव की वजह से कई बार पत्रकार सच्चाई नहीं बता सकता. ये बात शायद कम ही लोगों को पता होंगी कि जो जानकारी उस पत्रकार को है वह किसी और को नहीं हो सकती है.”
एक बातचीत में जॉन अब्राहम ने कहा था कि फ़िल्म-पत्रकारिता तो काफ़ी सरल और असल पत्रकारिता से कहीं पीछे होती है. इस बात पर अरशद भी उनकी बात से कुछ-कुछ सहमत नज़र आए.
वे हँसते हुए कहते हैं, “जो पत्रकारिता हमने फ़िल्म में की है वहाँ पर जान की बाज़ी लगानी पड़ती है और फ़िल्म में आपको हम जैसे लोगों को बर्दाश्त करना पड़ना है.”