किसी ज़माने में रेडियो का दूसरा नाम कहे जाने वाले अमीन सयानी आज भी उसी रुमानियत और जोश से भरे हैं. वही बोलने का अंदाज़, वही मीठी और अपनेपन वाली आवाज़.
लेकिन उनका ये सफ़र इतना आसान नहीं था. कभी वे गायक बनना चाहते थे. लेकिन बाद में जाने-माने ब्रॉडकास्टर बन गए. वे मानते हैं कि अच्छी हिंदी बोलने के लिए थोड़ा-सा उर्दू का ज्ञान ज़रूरी हैं.
रेडियो से संवाद और उसकी शैली और निजी जीवन से जुड़े विभिन्न पहलूओं पर उन्होंने वेदिका त्रिपाठी से लंबी बात की. बातचीत के कुछ अहम अंश-
अमीन सयानी जब रेडियो पर होते थे तो लोगों का हुजूम रेडियो सेट के सामने आकर चिपक जाता था और इंतज़ार होता था अपने एक अज़ीज़ साथी और हमदर्द का. ऐसी आवाज़ पाने के लिए क्या कोई विशेष ट्रेनिंग ली है?
मेरी भाषा कई मरहलों, कई तूफ़ानों और पथरीली राहों से होकर यहाँ तक पहुँची है. मैं एक ऐसे घर में पैदा हुआ था जहाँ कई भाषाओं का मिश्रण था. मेरे पिताजी ने बचपन में कभी पारसी सीखी थी और मेरी माँ गुजराती, अंग्रेज़ी और हिंदी बोलती थी. मैं बचपन में गुजराती बोलता था.
मेरी माँ गांधीजी की शिष्या थी. उन्होंने माँ को हिंदी, गुजराती और उर्दू में पत्रिका निकालने की सलाह दी. माँ ने ये काम मुझे सौंपा और इससे भी अपनी भाषाओं के विस्तार में काफ़ी मदद मिली.
शुरुआत में घबड़ाहट होती थी. मैं सोचता था कि मुझे हिंदी और उर्दू तो आती है लेकिन अब यही मुझे रेडियो पर बोलनी होगी. काफ़ी सोच-विचार कर मैंने अपने आपको तैयार किया. धीरे-धीरे अपने श्रोताओं के साथ मैंने अपनी भाषा में और सुधार लाया.
अपनी भाषा को मधुर बनाने में आपको सबसे ज़्यादा मदद कहाँ से मिली?
उस ज़माने के गीतकारों और संगीतकारों से भी मैंने बहुत कुछ सीखा. उनके गीतों के जो शब्द हुआ करते थे उनको सुनकर अपनी भाषा में मैंने और चार चाँद लगाया. मैंने हमेशा से इस बात का ख़याल रखा कि मेरी भाषा एकदम सरल और किसी आम इंसान के क़रीब हो.
एक बार लेखक कमलेश्वर ने मुझे अपने स्टूडियों में बुलाया था और ये मेरा पहला साक्षात्कार था. पहला ही सवाल उन्होंने पूछा कि अमीन भाई आप भाषाओं की हत्या क्यों करते हैं. मैं हड़बड़ा गया.
कमलेश्वर बोलने लगे कि आप ये कैसी भाषा बोलते हैं जिसमें कभी उर्दू, अग्रेंज़ी, बंगाली, मराठी तो कभी पंजाबी की खुशबू आ जाती है. आप तो हत्या करते हैं इनकी.
मैंने सोचा कि अब हमला हुआ है तो अपना बचाव तो करना ही पड़ेगा.
मैने कहा देखिए कमलेश्वर भाई, को-कम्यूनिकेशन दो पहियों की गाड़ी होती है. एक पहिया है वक्ता और दूसरा है श्रोता. इन दो पहियों में से कोई एक लुढ़क गया तो गाड़ी नहीं चल सकती.
जो मैं बोलता हूं वो सभी समझते हैं लेकिन जो कमलेश्वर बोलते है वो बहुत ही कम लोग समझते हैं.
अस्सी के दशक के बाद लोगों का रूझान रेडियो से हटकर टेलीविज़न पर ज्यादा जाने लगा. अचानक ऐसा लगने लगा कि शायद रेडियो का दौर खत्म हो रहा है. क्या कहेंगे आप?
टेलीविज़न की वजह से कभी भी रेडियो पर असर नहीं हुआ. टेलीविज़न में आवाज़ के साथ चित्र भी दिखाई देते हैं.
अब उसकी तरफ रूझान तो सामान्य सी बात थी. लेकिन रेडियो की अपनी कुछ ख़ास बातें हैं जिसको टेलीविज़न टक्कर नहीं दे सकता.
रेडियो जहाँ भी मरा है वो अपनी ख़ुद की वजह से मरा है. दोनों एक-दूसरे का मुक़ाबला करने के बजाए अगर सहारा दें तो ज़्यादा बेहतर होगा.
आजकल कई रेडियो चैनल्स खुल गए हैं और उनपर डॉक्यूमेंटरी या नाटक जैसी कई चीज़ें आजकल नहीं सुनाई पड़ती हैं. ऐसा क्यों?
ये बहुत ही अच्छी बात है कि आजकल के रेडियो पर चैटिंग होती है. बात करने वाला लोगों को सबसे ज्यादा भाता है.
जब मैं भी बोलता था तो शायद करोड़ों लोग उसे सुनते थे लेकिन मैं अपने सामने किसी एक को ही रखकर बोलता था. मेरे श्रोता भी मुझे अपने से दूर नहीं समझते थे.
चैटिंग बहुत अच्छी बात है अंतर सिर्फ़ यह है कि पहले हम जो भाषा बोलते थे उसे सँवारने की कोशिश करते थे लेकिन आज उसका स्तर गिरता जा रहा है. लेकिन यह पूरी दुनिया में हो रहा है.
हर किसी की ज़िंदगी में कोई ऐसी चीज़ ज़रूर होती है जिसका उसे अफ़सोस भी होता है. क्या अमीन सयानी को किसी बात का अफ़सोस है?
बचपन से मैं गाया करता था और पार्श्व गायक बनना चाहता था. लेकिन बड़ा होने के बाद मेरी आवाज़ फट गई और मेरी गायक बनने की तमन्ना अधूरी रह गई.
इतने बड़े ब्रॉडकास्टर का अनुभव तो हर कोई बाँटना चाहेगा. तो क्या आप हमारी पीढ़ी के नौजवानों को और रेडियो जॉकी बनने की इच्छा रखने वालों को कुछ बताना चाहते हैं.
मेरे ख़याल से वे रेडियो पर जो भी भाषा बोलें पहले वह ठीक से समझ लें. मुश्किल और किताबी भाषा बिल्कुल नहीं होनी चाहिए.
भाषा ऐसी होनी चाहिए कि आप बात करें और वह सीधे समझ में आ जाए और डिक्शनरी देखनी की नौबत नहीं आए.