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शुक्रवार, 15 दिसंबर, 2006 को 09:46 GMT तक के समाचार

विजयकिशोर मानव की कविताएँ

एक

यहाँ मिले जो रूखा-सूखा
खाकर सो जाना
तोते से कहती है मैना
अब न शहर जाना!!

उजले-उजले चेहरे सबके
भली-भली पोशाकें,
सबकी बंद आस्तीनों से
साँप सैकड़ों झाँकें,
सोने के पिंजरे, मालिक की बोली
पंख कटे
होता है बिल्ली का घर
अक्सर आना-जाना
तोते से कहती है मैना
अब न शहर जाना!!

बंधी अलगनी के ऊपर आकाश नहीं अपना
कोई भी मौसम हो
उड़ने का देखो सपना
ख़ुद पर हँसना, ख़ुद पर रोना
सूली पर सोना
साँस चले तब तक बस
पिंजरों का आबोदाना
तोते से कहती है मैना
अब न शहर जाना!!

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दो

देह में मन में महाभारत
सारथी धृतराष्ट्र का परिवार!
पार्थ जीतेंगे नहीं इस बार!!

चुप्पियों के जाल बुनते हैं
हर शहर की चीख़ सुनते हैं,
मुस्कराते बुत सियासत के
अनवरत सिर लोग धुनते हैं,
संधियाँ सब टूटने वाली
ख़ून से भीगे हुए अख़बार!
पार्थ जीतेंगे नहीं इस बार!!

आदमी को आदमी कहना
अब बहुत मुश्किल यहाँ रहना
इंक़लाबों को हिदायत है
रुख़ हवा का देखकर बहना
हैं ढके चेहरे मुखौटों से
नाटकों के मंच हैं दरबार!
पार्थ जीतेंगे नहीं इस बार!!

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तीन

मेज़ पर टिकी कुहनी दर्द करे
या माथा गर्म रहे दिन भर
कुछ भी तो नया नहीं है!!

आँख खुली शुरू हो गया फिर से
सिलसिला पहाड़ों पर चढ़ने का
कल के बदसूरत से चेहरे को
नए साँचे में गढ़ने का,
आँखों में धूप लगे गर्द भरे
या कोई खड़ा रखे पिन पर
कुछ भी तो नया नहीं है!!

दफ़्तर की हर फ़ाइल में
स्याही से अलग-अलग मिलना,
और लौट कर चिथड़ी शामें
अंधियारे कमरों से सिलना
अफ़सर डांटे, उनका चेहरा उतरे,
या कोई कुर्क करे घर
कुछ भी तो नया नहीं है!!