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शुक्रवार, 08 दिसंबर, 2006 को 11:18 GMT तक के समाचार

बच्चों की कविताएँ, बच्चे ही कवि

इन सभी कविताओं के रचयिता छह से ग्यारह वर्ष आयु के बच्चे हैं और दिल्ली की झुग्गी झोंपड़ियों में रहते हैं.

हम सब्जियाँ

आलू गोल गोल है,
टमाटर होता लाल लाल,
फूलगोभी भी है कमाल.

पालक की साग,
साथ में रोटी,
खाके सेहत होती मोटी.

बैंगन का भर्ता, होता स्वाद
खाके दुनिया, करती याद.

देखो प्याज का कमाल
सब सब्जियों में करे धमाल.

रचनाकारः सुनील कुमार,
पाँचवीं कक्षा का छात्र

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नानी का चश्मा

भूल गई थी अपना चश्मा
लटका करके नानी
खोज रही थी सारे घर में
खूब हुई परेशानी,
नहीं मेज पर नहीं कहीं भी
खोज खोज कर वह हारी
आँचल से वह ढंका हुआ था
ऊपर से थी साड़ी
किंशुक ने तब पूछा, नानी!
गले में काला-काला
धागा क्यों है पहना तुमने
क्या है पूजा वाला?
बच्चे मेरे नहीं है धागा
यही है चुप्पा चश्मा
बोल कहीं जो पाते चश्मे
होता बड़ा करिश्मा.

रचनाकारः प्रिंस, ग्यारह वर्ष
पाँचवीं कक्षा का छात्र

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स्लेट

स्लेट हम सबका साथी है,
हम इसपे लिखते हैं,

ये हमको नए नए अक्षर सिखलाती है,
हमारा ज्ञान बढ़ाती है,
ये देखने में काली है,
मगर हम सबको बहुत प्यारी है.

रचनाकारः करण, छह वर्ष
नर्सरी का छात्र