गुरुवार, 30 नवंबर, 2006 को 15:16 GMT तक के समाचार
प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक, उर्दू के जानेमाने कवि और साम्यवादी आंदोलन के एक बड़े नेता सज्जाद ज़हीर के जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को सामने लाई हैं उनकी सबसे छोटी बेटी नूर ज़हीर.
सज्जाद ज़हीर की सौंवीं जयंती के अवसर पर प्रकाशित पुस्तक 'मेरे हिस्से की रौशनाई' का एक अंश आपके सामने प्रस्तुत हैः
"कभी-कभार किसी बड़े अदीब की आमद अम्मी और अब्बा के लिए ख़ुशी और मुश्किल दोनों का सबब बन जाती. 1969 में जोश मलीहाबादी के पाकिस्तान से तशरीफ़ लाने की ख़बर मिली.
वे बहुत सालों बाद हिंदुस्तान आ रहे थे और उनका आना अचानक तय हुआ था. अम्मी-अब्बा एक के बाद एक दो शादियों से, यानी नजमा और नसीम को विदा करके बस साँस ही लेने बैठे थे. जो अम्मी ने जोड़-जाड़ कर रख छोड़ा था सब ख़र्च हो चुका था, यहाँ तक कि काफ़ी उधार भी हो गया था.
अम्मी ने अपने दफ़्तर, रशन इनफ़ॉर्मेशन सेंटर से काफ़ी क़र्ज़ लिया था जो हर माह उनकी तनख़्वाह से कट रहा था. अम्मी घर की इज़्ज़त बनाए हुए खर्च में कटौती कर रही थीं.
नादिरा को लखनऊ के आईटी कॉलेज के हॉस्टल से निकाल कर हमारे मामू के घर रखा गया था. हौज़ख़ास के घर पर महफ़िलें तो कम हुई ही थीं, खाने में भी सादगी आ गई थी.
अम्मी और अब्बा दोनों ने तर्जुमे का काम ले लिया था. आमदनी बढ़ाने के लिए अब्बा आथेलो और अम्मी ब्रेख्त के “लाइफ आफ गलेलियो गलेली”, का उर्दू तर्जुमा कर रहे थे.
ऐसे में जोश साहब तशरीफ़ ला रहे थे और जैसे सब अदीबों ने मान लिया कि जोश साहब ठहरें चाहे जहाँ, उनका उठना-बैठना, मिलना मिलाना तो बन्ने भाई के घर ही होगा.
लिहाज़ा घर पर दोबारा शाम को जमघटों का सिलसिला शुरू हो गया, जिसमें ये बातें होतीं कि जोश साहब की शान में क्या-क्या जलसे होने चाहिए. कुछ इधर-उधर करके अम्मी ने तो रोज़ की उन महफ़िलों और खानों का सिलसिला तो जारी रखा मगर उनकी पूरी शख़्सियत ने जैसे एक फिक्र की अबा ओढ़ ली थी.
अब्बा के दायरे में बहुत से ऐसे लोग थे जो ना तो अदबी थे ना सियासतदाँ, ना किसी बड़े अदीब के मुसाहिब ना अदब की गुफ़्तगू के शैदाई. लेकिन फिर भी वे अब्बा के ऐसे मुरीद थे कि उन्हें किसी भी वक़्त, किसी भी काम के लिए तलब किया जा सकता था.
इन्हीं में से एक थे रवि चोपड़ा. रवि चचा इन बाक़ी मुरीदों से एक क़दम आगे थे. उन्हें हमारे घर के माली हालात के उतार-चढ़ाव की भनक न जाने कैसे हो जाया करती थी. और वे किसी भी तरह की मदद को आ पहुँचते.
इस बार भी वे अपनी एम्बैसडर गाड़ी लिए नमूदार हुए और अब्बा को साथ लेकर चले गए. दो घंटे बाद जब अब्बा घर लौटे तो उन्होंने अम्मी से इशारों में कुछ बातें की जिससे उनके चेहरे से परेशानी की लकीरें हलकी हो गईं और अब्बा हस्बे-मामूल दोस्तों को फ़ोन कर-करके बुलाने लगे.
जोश साहब की ख़ातिर अच्छी तरह से हो रही है – इस ख़ुशी में अब्बा ने शाम की दावत में कुछ ज़रा ज्यादा पीली. बस इतनी कि अपनी कही हुई बातों पर ख़ुद ही ज्यादा ख़ुश होने लगे.
नज़्मों, ग़ज़लों का सिलसिला जारी था. अब्बा भी, शायद यह सोच कर कि जोश साहब फिर न जाने कब मिलें, उन्हें अपनी एक ग़ज़ल सुनाने लगे. ग़ज़ल का मतला था-
तुझे क्या सुनाएँ हमदम, इसे पूछ मत दुबारा
किसी और का नहीं था, वो क़ुसूर था हमारा
शेर सीधा-सादा और अच्छा था. सब ने दाद दी, जोश साहब ने भी दी. अपने शेर से अब्बा ख़ुद इतने मुत्तासिर हुए कि उसे दुबार सुनाया, इस बार भी दाद मिली. दूसरी से तीसरी बार जब सुनाया तो दाद मिली तो मगर थोड़ी बुझी हुई. तीसरी से चौथी बार जब हुआ तो लोगों ने ज़रा कसमसाना शुरू किया.
जोश साहब मौक़े की नज़ाकत को ताड़ गए. मुस्कुरा कर बोले, “मियाँ सब आपको बतौर कम्युनिस्ट के जानते और मानते हैं. बहुत कर चुके सेल्फ़ क्रिटिसिज़्म अब आगे भी तो बढ़िए”.
जोश साहब की दिल्ली में आख़िरी शाम थी. घर लोगों से खचाखच भरा था. जोश साहब गावतकिया लगाए तख़्त पर आसन जमाए थे. फ़िज़ा की ख़ुशी में हलका सा नमक घुला था जो किसी अज़ीज़ को रुख़्सत करते हुए दबे हुए आँसुओं का मज़ा लिए हुए होता है.
बात बार-बार घूम कर, जोश साहब की वापसी से हिंदुस्तान-पाकिस्तान की दोस्ती, अदब में नई रवायात और जनूबी एशिया में कम्युनिस्ट मूवमेंट के मुस्तक़बिल पर आ जाती थी.
अचानक एक साहब जो ख़ुद तो कम्युनिस्ट नहीं थे लेकिन अपने-आप को सिम्पेथाइज़र क़रार देते थे, बोले, “साहब क्या मुस्तक़बिल हो सकता है कम्युनिस्ट मूवमेंट का? यहाँ सज्जाद ज़हीर जैसे कम्युनिस्ट हैं. मख़मल की सद्री पहने बैठे हैं और घर में आलविन का नया फ़्रिज रखते हैं”.
पल भर को तो महफ़िल सन्न रह गई. ज़्यादातर लोग जानते थे वो फ़्रिज अम्मी ने क़िस्तों पर दो साल में ख़रीदा था. वह मख़मल की सद्री भी नजमा बाजी ने लंदन से अपनी पहली कमाई से ख़रीद कर भेजी थी.
इससे पहले कि कोई कुछ कहे रवि चचा आस्तीन चढ़ाते हुए उठ खड़े हुए. अब्बा ने पीछे से उनके कंधे पर हाथ रखा., “बैठो रवि.... बैठ जाओ”.
फिर उन्होंने एक पल के लिए अम्मी की तरफ़ देखा और अम्मी ने फ़ौरन बात संभाल ली- “भई, ये कबाब क्यों रखे हैं अभी तक ? ये तो कोई बात नहीं हुई कि हम इतनी मेहनत से पकाएँ और आप लोग कोई खाएँ ना. कम से कम मेहनताना तो दीजिए”.
बात पलट गई, लोग इधर-उधर की दूसरी बातें करने लगे. जोश साहब चुपचाप अपने व्हिस्की के गिलास अपनी तय की हुई आधे घंटे फ़ी गिलास की रफ़तार से पीते रहे.
गिलास ख़ाली करके मुस्कुराए और सब को देख कर बोले, “हाँ भई साहब! एक रुबाई सुनिए- अभी कही है”.
महफ़िल इरशाद, इरशाद से गूंज उठी. हाथ उठा कर उन्होंने सब को ख़ामोश होने का इशारा किया और उन साहब से जिन्होंने अब्बा की मखमल की सद्री की वजह से कम्युनिस्ट मूवमेंट के ख़त्म हो जाने का ऐलान किया था, मुख़ातिब होते हुए बोले, “ग़ौर फ़रमाइए साहब ख़ास आप के लिए कही है”.
वह साहब फ़ख़्र से फूल कर पंजाबी भठूरा हो गए. इतराते हुए बोले, "इरशाद जोश साहब, ज़हे नसीब”. जोश साहब ने ताकीद की – पहले रुबाई तो सुन लीजिए, फिर नसीब की तारीफ़ कीजिएगा. सुनिए-
भूखों का जो हमदर्द हो, वो खुद भी न खाए
गिर्दाबज़दों का दोस्त कश्ती न चलाए
इस मनतिक़े बेहूदा के मानी ये हैं
घोड़ों का जो हमदर्द हो घोड़ा हो जाए."
पृष्ठ 34-36
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मेरे हिस्से की रौशनाई
लेखिका - नूर ज़हीर
मेधा बुक्स
कुल पृष्ठ 136, मूल्य - 50 रुपए