गुरुवार, 23 नवंबर, 2006 को 21:52 GMT तक के समाचार
विष्णु नागर
हमारा क्या है
हम तो जी मुर्गेमुर्गियाँ हैं
हमें ऐसे मार दो या वैसे मार दो
हलाल कर दो या झटके से मार दो
चाहो तो बर्ड फ्लू हो जाने के डर से मार दो
मार दो जी, जीभरकर मार दो
मार दो जी, हज़ारों और लाखों की संख्या में मार दो
परेशान मत होना जी, यह मजबूरी है हमारी
कि मरने से पहले हम तड़पती ज़रूर हैं.
चीख़ती-चिल्लाती ज़रूर हैं
चेताती हैं ज़रूर कि लोगो, भेड़-बकरियो और मनुष्यो तुम भी
अच्छी तरह सुन लो, समझ लो, जान लो
कि आज हमें मारा जा रहा है तो कल तुम्हारी बारी भी आ सकती है
अकेले की नहीं लाखों के साथ आ सकती है
हम जानती हैं हमारे मारे जाने से क्राँतियाँ नहीं होतीं
हम जानती हैं कि हमारे मारे जाने को मरना तक नहीं माना जाता
हम जानती हैं
हम आदमियों के लिए सागसब्जियाँ हैं, फलफ्रूट हैं
हमारे मरने से सिर्फ़
आदमी का खाना कुछ और स्वादिष्ट हो जाता है.
हमें मालूम है मुर्गे-मुर्गी होने का मतलब ही है
अपने आप नहीं मरना, मारा जाना
हमें मालूम है हम मुर्गेमुर्गी होने का अर्थ नहीं बदल सकते
फिर भी हम मुर्गेमुर्गियाँ हैं
जो कभी किसी कविता, किसी कहानी में प्रकट हो जाते हैं
हम मुर्गेमुर्गियाँ हैं
इसलिए कभी किसी को इस बहाने यह याद आ जाता है
कि ऐसा मनुष्यों के साथ भी होता है, फिर-फिर होता है
हम मुर्गेमुर्गियाँ हैं इसलिए हम सुबह कुकड़ू कूँ ज़रूर करते हैं
हम अपनी नियति को जानकर भी दाने खाना नहीं छोड़ते हैं
कुछ भी, कैसे भी करो
मुर्गेमुर्गियों को आलू बैंगन नहीं समझा जा सकता.
******************************************
फ़र्क पड़ता है
(युवा कवि निशांत के लिए)
मौसम बदलता है तो फ़र्क पड़ता है
चिड़िया चहकती है तो फ़र्क पड़ता है
बेटी गोद में आती है तो फ़र्क पड़ता है
किसी को किसी से प्रेम हो जाता है तो फ़र्क पड़ता है
भूख बढ़ती है, आत्महत्याएँ होती हैं तो फ़र्क पड़ता है
आदमी अकेले भी लड़ता है तो फ़र्क पड़ता है
आसमान में बादल छाते हैं तो फ़र्क पड़ता है
आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं तो फ़र्क पड़ता है
यहाँ तक कि यह कहने से भी आपमें और दूसरों में फ़र्क पड़ता है कि
क्या फ़र्क पड़ता है.
जहाँ भी आदमी है, हवा है, रोशनी है, आसमान है, अँधेरा है
पहाड़ हैं, नदियाँ हैं, समुद्र हैं, खेत हैं, पक्षी हैं, लोग हैं, आवाज़ें हैं,
नारे हैं
फ़र्क पड़ता है.
इसलिए फ़र्क लाने वालों के साथ लोग खड़े होते हैं
और लोग कहने लगते हैं कि फ़र्क पड़ता है.
******************************************
सफलता और पुनर्जन्म
सफल आदमी को आप और ज़्यादा सफल होने से रोक नहीं सकते
उसे रोकेंगे तो वह रुकेगा नहीं
बल्कि जितना रोकेंगे, उतना ही ज़्यादा वह तेज़ी से दौड़ने लगेगा
और समय से बहुत पहले सफल होकर दिखा देगा
सच तो यह है कि इससे पहले कि आपको पता चले कि वह और सफल हो चुका है
वह और-और सफल होने के लिए दौड़ना शुरू कर चुका होगा
आप कहेंगे कि जरा इस बेवकूफ़ से पूछो तो कि
उसने ये सफलता किस क़ीमत पर हासिल की है
तो वह कहेगा कि सफलता के लिए कोई भी क़ीमत कम नहीं
यहाँ तक कि मौत भी
क्योंकि आदमी का पुनर्जन्म होता है
बाक़ी सफलताएँ वह अगले जन्म में हासिल कर सकता है.
******************************************
प्रेम
प्रेमी सोचता है कि
उसकी आँखों की भाषा सिर्फ वही पढ़ रही है
उसके संकेतों को सिर्फ़ वही समझ रही है
इस तरह का भ्रम प्रेमिका को भी होता है
भ्रम न रहे तो बताइए प्रेम कैसे हो!
******************************************
विष्णु नागर
ए-34, नवभारत टाइम्स अपार्टमेंट्स
मयूर विहार, फेज़-1
दिल्ली-110091
email - vnagar@hindustantimes.com