शुक्रवार, 17 नवंबर, 2006 को 23:17 GMT तक के समाचार
देव आनंद
अतिथि संपादक, बीबीसी पत्रिका
प्यार तो हो ही जाता है.
जब प्यार हो जाता है तो नफ़रत भी हो सकती है. किसी से आप प्यार करते हैं तो किसी से नफ़रत भी कर सकते हैं. आपको भी लोग प्यार करते हैं और नफ़रत भी करते हैं.
आख़िर आप इंसान ही तो हैं कोई भगवान तो नहीं. प्यार और नफ़रत तो सामान्य इंसानी फ़ितरत है.
और जब आप इंसान हैं तो इंसानियत से अहम आपके लिए क्या हो सकता है. इंसानियत का मतलब यह कि आप अपना काम करते रहें लेकिन आपके काम से किसी को दुख न पहुँचे. किसी की भावनाओं को आप जानबूझकर आहत न करें.
काम ऐसा करो कि उसका विस्तार देखकर लोग चकित हो जाएँ और दुनिया उसे याद रखे. हर काम ऐसा होना चाहिए कि उसमें आपका असर दिखाई दे, आपकी एक छाप उस पर हो.
इसी छाप से, इसी असर से आपको लोग पहचानेंगे और याद रखेंगे.
जो आदमी दुनिया में आता है और बिना कुछ किए मर जाता है तो उसका जीवन व्यर्थ है.
अमर होने का मतलब कोई 200 या 500 साल जीना तो होता नहीं है, वह तो कोई नहीं जी सकता, तो अमरत्व का मतलब है आपके बाद आपके काम का जीवित रहना.
ऐसा मकाम जीवन में हासिल करना पड़ता है कि आप जो कुछ भी करो वह ऐसा हो कि बचा ही रहे.
जब आप अपने काम में व्यस्त रहेंगे, रमे रहेंगे तो मस्त रहेंगे. फिर उसे कोई फ़िक्र भी नहीं होती कि आसपास क्या हो रहा है और फिर ऐसा मकाम हासिल करना मुश्किल भी नहीं है.
यह मकाम बहुत मेहनत के बाद, बहुत समय बाद आता है. इसके लिए बहुत सृजनात्मकता की ज़रुरत होती है.
अगर आप सृजनशील हैं और आपमें लगन है तो फिर आपको अमर होने से कोई नहीं रोक सकता.