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गुरुवार, 16 नवंबर, 2006 को 14:27 GMT तक के समाचार

सलमा ज़ैदी
संपादक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम

बलात्कार का दंश झेलता है पूरा परिवार

किसी भी महिला का बलात्कार केवल उसके शरीर पर ही अत्याचार नहीं होता है बल्कि बलात्कार होता है उसकी अस्मिता का, उसके मन का, उसके अभिमान का.

इससे बड़ा अपराध और क्या हो सकता है कि एक औरत जिसका मनोबल, उसकी बुद्धिमत्ता और उसका सामर्थ्य किसी तरह भी पुरुष से कम नहीं है सिर्फ़ इसलिए यह यंत्रणा झेलने पर विवश होती है क्योंकि वह क़ुदरती तौर पर, पुरुष से शारीरिक रूप से कमज़ोर है.

बलात्कार से ज़्यादा घिनावना कृत्य मेरी नज़र में तो और कोई हो ही नहीं सकता और वह बलात्कार जब किसी मासूम किशोरी का हो तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

इराक़ में 14 साल की बच्ची के बलात्कार का दोष स्वीकार करके उस सैनिक ने अपनी अंतरात्मा से चाहे बोझ उतार दिया हो लेकिन कोई भी सज़ा क्या इस जघन्य अपराध की विभीषिका को कम कर सकती है.

इस तरह की ख़बरें जब अख़बार में छपती हैं तो कई माँओं की रातों की नींदें उड़ जाती हैं.

वह माँ जो बच्चे को फाँस चुभ जाने पर बेचैन हो उठती है, अपनी बच्ची पर यह ज़ुल्म होते देख किस नर्क से होकर गुज़री होगी यह बताने को वह आज जीवित नहीं है.

उन सैनिकों ने उस पूरे परिवार को मौत के घाट उतार कर उन्हें यह यातना उम्र भर झेलने से मुक्त कर दिया.

लेकिन ज़रा सोचिए, वे कुछ क्षण जब वे मजबूर हो कर उन सैनिकों के हाथों बलात्कार का शिकार होती अपनी बेटी का चीत्कार सुनते रहे, वे लम्हे उनके लिए कितने लंबे रहे होंगे.

इस तरह की ख़बरें दुनिया के हर हिस्से से आती हैं. इस तरह का अपराध करने वाले का कोई रंग, कोई जाति और कई नागरिकता नहीं होती. वह केवल वहशी होता है.

एक पत्रकार से अपेक्षा की जाती है कि वह तटस्थ रह कर अपने दायित्व का निर्वाह करे. लेकिन उस पत्रकार के भीतर छिपी औरत और माँ के दिल को कौन समझाए?