शुक्रवार, 10 नवंबर, 2006 को 11:21 GMT तक के समाचार
सलमा ज़ैदी
संपादक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम
फ़िल्म अभिनेत्री रेखा ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, "मैं ने जीवन में कभी भी कोई पुस्तक नहीं पढ़ी".
ऐसा ही बयान फ़ुटबॉल खिलाड़ी डेविड बेकहम की पत्नी और पॉप गायिका रह चुकीं विक्टोरिया बेकहम की ओर से भी आ चुका है.
ठीक है, हर एक के अपने-अपने शौक़ हैं. किसी को पढ़ने में रुचि है तो कोई संगीत का दीवाना है. किसी को नए-नए व्यंजन बनाना अच्छा लगता है तो कोई फ़िल्में देख कर समय व्यतीत करता है.
सबकी अपनी-अपनी राय है लेकिन मेरा ख़ुद का मानना है कि ढाई घंटे की फ़िल्म वह ख़ज़ाना मुहैया नहीं करा सकती जो ढाई सौ पन्नों की पुस्तक में छिपा हुआ है.
किताबों की दुनिया के बारे में कभी उनसे बात कीजिए जिनका जीवन उनके बिना अधूरा है.
उनका दिन शुरू होता है तो पुस्तकों से और रात को पुस्तक के पन्ने पलटे बिना नींद उनके दरवाज़े पर दस्तक नहीं देती.
अपनी ही बात करूँ तो घर से दफ़्तर के 45 मिनट के सफ़र में किताब की बदौलत रास्ता ऐसे कट जाता है कि पता भी नहीं चलता.
कभी-कभी सोचती हूँ कि किताबें पढ़ने का यह शौक़ क्या जन्मजात होता है या पैदा कराया जाता है?
इसका जवाब मुझे यह समझ में आता है कि इस बारे में माता-पिता की बड़ी भारी ज़िम्मेदारी है.
यह आदत बचपन से ही डाली जा सकती है. मैं ऐसे बच्चों को जानती हूँ जो खिलौनों की दुकान के आगे से चुपचाप निकल जाएँगे लेकिन नई पत्रिकाएँ या कॉमिक देखते ही मचल उठेंगे.
कई लोगों को किताबें रद्दी का ढेर भी लगती होंगी लेकिन, फिर मेरा अपना अनुभव तो यह है किताबों ने मेरे जीवन को समृद्ध करने का काम ही किया है.
किताबों ने मुझे वह दुनिया दिखाई है जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती.
अनुवाद
मेरे घर के पास की स्थानीय लायब्रेरी में बहुत सी भाषाओं के अंग्रेज़ी और हिंदी में अनुवाद मौजूद हैं.
मैं ने कई पूर्वी यूरोपीय और अफ़्रीकी महिला लेखिकाओं की पुस्तकें सिर्फ़ यह देखने के लिए पढ़ीं कि उनकी सोच या उनकी संवेदनाएँ भारतीय लेखिकाओं से कैसे अलग है.
पढ़ने पर पता चला कि संवेदनाएँ एक ही जैसी हैं बस बयान करने की शैली अलग है.
अपनी बात दिवंगत रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता सफ़दर हाशमी की इन पंक्तियों के साथ ख़त्म करती हूँ कि,
किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तु्म्हारे पास रहना चाहती हैं...
(पत्रिका पर अपनी राय भेजते रहें. पता है: hindi.letters@bbc.co.uk)