शुक्रवार, 10 नवंबर, 2006 को 13:28 GMT तक के समाचार
देव आनंद
अतिथि संपादक, बीबीसी पत्रिका
ख़ूबसूरती क्या है?
यह अपने आप में एक कठिन सवाल है कि ख़ूबसूरती क्या है.
कहते हैं कि ख़ूबसूरती किसी वस्तु या व्यक्ति में नहीं देखने वाले की आँखों में होती है. यानी आपके देखने का अंदाज़ कैसा है, इस पर निर्भर करता है कि आपको कौन और क्या ख़ूबसूरत लगे.
कहते हैं कि हर किसी में कुछ न कुछ ऐसा तो होता ही है जो किसी न किसी को अच्छा लगे. कोई तो बात होती है हर किसी में. किसी का अंदाज़ अच्छा होता है, किसी की बातें अच्छी होती हैं तो किसी की बुद्धिमत्ता अच्छी होती है.
तो मैं कहता हूँ कि जो भा जाए वही ख़ूबसूरती है. भा जाना ही ख़ूबसूरती की परिभाषा है.
मैं जब अपनी फ़िल्म के लिए कास्टिंग कर रहा होता हूँ तो यह परिभाषा बड़े काम आती है. मुझे एक ख़ूबसूरत लड़की चाहिए. तो मैं देखता हूँ कि स्क्रिप्ट को कैसी ख़ूबसूरत लड़की चाहिए. अगर वह स्क्रिप्ट के कैरेस्टेरिस्टिक से मिल जाए तो ख़ूबसूरत हो गई समझो.
एक बार स्क्रिप्ट के हिसाब से ख़ूबसूरत लड़की मिल जाए तो कोशिश करता हूँ कि वह पर्दे पर सबसे ख़ूबसूरत दिखाई दे.
अगर मैं सोचूँ कि मुझे एक ख़ूबसूरत लड़की पर फ़िल्म बनानी है तो तय है कि एक बदसूरत लड़की को लेकर फ़िल्म बनाउँगा और वह पर्दे पर सबसे ख़ूबसूरत दिखाई देगी.
'हरेरामा हरेकृष्णा' के लिए जब मैं लड़की की तलाश कर रहा था तो ज़ीनत अमान मिली. लोगों ने कहा कि बाहरी सी लड़की लगती है, अच्छी नहीं रहेगी. लेकिन मैं नहीं माना. आख़िर मैंने उसे ख़ूबसूरत साबित किया और दुनिया भर के लोगों ने इसे माना. फ़िल्म इंडस्ट्री ने बरसों उसे अपनाए रखा.
'फूलन देवी' भी एक फ़िल्म की नायिका थी और कहानी के हिसाब से ख़ूबसूरत थी.
आदमी का दिमाग तो बदलता रहता है लेकिन ख़ूबसूरती की परिभाषा नहीं बदलती.