मंगलवार, 07 नवंबर, 2006 को 12:37 GMT तक के समाचार
वेदिका त्रिपाठी
मुंबई से
‘द वारियर’, ‘ए माइटी हार्ट’, ‘द नेमसेक’ जैसी कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों के अभिनेता इरफ़ान ख़ान के पास आज काम की कमी नहीं है लेकिन उन्हें अपनी एक्टिंग को साबित करने में एक लंबा वक़्त ज़रूर लगा.
1990 में मुंबई आने के बाद उन्होंने धारावाहिकों से अपने अभिनय की शुरुआत की.
बॉलीवुड की फ़िल्में ‘मक़बूल’, ‘हासिल’ और ‘रोग’ से इन्होंने इंडस्ट्री में अपने अभिनय की ऐसी छाप छोड़ी कि आज उनके पास बॉलीवुड के साथ साथ हॉलीवुड की भी कई फ़िल्में हैं.
फिलहाल इरफ़ान पुणे में हॉलीवुड अभिनेत्री एंजेलीना जोली और अभिनेता ब्रैड पिट के साथ अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म ‘द माइटी हार्ट’ को पूरा करने में जुटे हैं.
10 नवंबर 2006 को प्लस इंटरटेनमेंट की हिंदी फ़िल्म ‘डेडलाइन-सिर्फ़ 24 घंटे’ रिलीज़ हो रही है जिसे लेकर इरफ़ान काफ़ी उत्साहित हैं. इस फ़िल्म में उनके अलावा कोंकणा सेन शर्मा, रजत कपूर, ज़ाकिर हुसैन, संध्या मृदुल और बाल कलाकार झनक शुक्ला भी हैं.
उनकी इसी फ़िल्म और उनकी जिंदगी के कुछ और अनछुए पहलुओं को जानने की हमने कोशिश की :
आपकी आनेवाली फ़िल्म ‘डेडलाइन - सिर्फ 24 घंटे’ के बारे में कुछ बताइए ?
इस फ़िल्म में मैं एक लेखक के किरदार में हूँ. इसके साथ ऐसे कुछ हालात आते हैं कि ये लेखक एक किडनैपर बन जाता है. यह ऐसा किरदार है जो आपको हँसाएगा तो नहीं लेकिन डराने और रुलाने की क्षमता से परिपूर्ण है. इस फ़िल्म के बाद लोगों में एक तरह की जागरूकता आएगी. मेरे लिए यह फ़िल्म बहुत ही अहम है.
तो क्या ‘डेडलाइन - सिर्फ 24 घंटे’ को आप अपनी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में देखते हैं ?
हाँ, यह एक बहुत ही अच्छी फ़िल्म है. इस फ़िल्म की शूटिंग एक ही शेड्यूल में बन गई. निर्देशक तनवीर खान ने इसकी कहानी के साथ पूरा इंसाफ़ किया है.
केके मेनन, राहुल देव और आप जैसे कई बेहतरीन कलाकारों को इंडस्ट्री में देर से पहचान मिली, इसकी क्या वजह मानते हैं ?
मैं मानता हूँ कि हर किसी का अपना समय और नसीब होता है. हमें अपना काम करना चाहिए बस. मैं हमेशा अपने काम को लेकर सजग रहता हूँ. हर किसी को फ़ेम और नेम चाहिए पर नसीब ने हर किसी के लिए कुछ प्लान कर रखा है.
सफलता की सीढ़ियों के क़रीब आने में एक लंबा समय लग गया आपको, कभी दुख नहीं हुआ ?
ऐसा नहीं है कि मुझे दुख नहीं हुआ, लेकिन काम करते रहने के अलावा मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था. कभी कभी बहुत 'इंसेक्यूरिटी' (असुरक्षा) का एहसास होता था पर मैं सोचता कि गंभीरता से अपना काम करते रहना चाहिए बाकी तो वक़्त ही बताएगा. देर से ही सही लेकिन मेहनत का फल ज़रूर मिलता है. बड़े-बड़े आए और चले गए. समय सिर्फ़ एक का होकर नहीं रह सकता है.
आप बॉलीवुड के साथ ही कई इंटरनेशनल फ़िल्मों में भी काम कर रहें हैं, इसके लिए आपने कोई प्लानिंग की है या फिर किसी पीआर की मदद ले रहे हैं ?
नहीं, मैं इन सब बातों में यकीन नहीं रखता हूँ. मैं अपने आपको बदल नहीं सकता. अगर फ़िल्म के लिए पब्लिसिटी की ज़रूरत है तो मुझे कोई तक़लीफ नहीं है लेकिन मैं सिर्फ अपनी पब्लिसिटी करने के लिए चीज़ों को बना (क्रिएट) नहीं सकता हूँ.
फिर हॉलीवुड की फ़िल्में कैसे मिली ?
बस मिल गई. मैंने इसके लिए कोई प्लानिंग नहीं की थी. मैंने हमेशा अच्छे काम की तलाश की और उसके लिए कोशिश भी की. मेरे ख़याल से आप जो भी काम करते हैं उसका तार कहीं न कहीं जुड़ा होता है और मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ.
‘ए माइटी हार्ट’ के अलावा मीरा नायर की इंटरनेशनल फ़िल्म ‘द नेमसेक’ में भी आप काम कर रहें हैं कैसा अनुभव रहा ?
बहुत ही बढ़िया अनुभव रहा दोनों टीमों के साथ काम करके. जहाँ तक फ़िल्मों की बात है तो वो मैं ज़्यादा नहीं बता सकता क्योंकि वो मेरे कॉंट्रैक्ट में है. मीरा नायर तो सिर्फ नेमसेक के लिए फ़िल्म करेंगी नहीं. इस तरह की फ़िल्मों में काम करना मुझे 'यूनीकनेस' (अनूठा) और 'एक्स्ट्राऑर्डिनरी' (असाधारण) होने का एहसास दिलाता है.
आपको एक गंभीर कलाकार के रूप में देखा जाता है तो क्या आप निजी जीवन में भी ऐसे ही हैं ?
मैं अपनी निजी ज़िंदगी में बिल्कुल भी गंभीर नहीं हूँ. मैं तो कहता हूँ कि जो लोग असल में इतने गंभीर होते हैं भगवान उनकी मदद करे. मैं सिर्फ अपने काम को गंभीरता से लेता हूँ. हाल ही में मैंने कहीं पढ़ा कि संतुलन बनाए रखने के लिए गंभीर मुद्दों को हल्का और हल्के मुद्दों को गंभीरता से लें. मेरे ख़याल से ये सचमुच कारगर होता है. अपने आसपास मैं थोड़े मज़ाकिया और चुलबुले लोगों को पसंद करता हूँ.
लेकिन आपके काम को गंभीर एक्टिंग के रूप में माना जाता है ?
असल में मैं सिर्फ गंभीर भूमिकाओं के लेबल में ही बंधकर नहीं रहना चाहता. मैं हर तरह की भूमिकाएँ निभाना चाहता हूँ. इसके लिए मैं प्रयास भी कर रहा हूँ. मैं कॉमेडी फ़िल्में भी करना चाहता हूँ.
आपकी एक्टिंग का कोई तरीका (मेथड) है ?
मेरे ख़याल से हर किसी के एक्टिंग का अपना तरीका और अपनी टेक्नोलॉजी होती है. इसे सीखना मुश्किल है. यह एक क्राफ़्ट है जिसे सीखा जा सकता है लेकिन उसके पहले आपके पास भी कुछ कला होनी ज़रूरी है.
आपके किरदारों के लिए कोई ख़ास ट्रेनिंग लेने की ज़रूरत पड़ती है ?
कई किरदार के लिए ट्रेनिंग लेनी पड़ती है. जैसे फ़िल्म ‘द नेमसेक’ में मेरा किरदार एक ऐसे बंगाली का है जिसका 'लुक्स' ऐसा है कि वो बंगाली है लेकिन विदेश में रहता है. इसके अलावा उसके बोलने का एक्सेंट (तरीका) भी बंगाली ही था. मेरे लिए यह एक मुश्किल रोल था. कभी-कभी पढ़ने के साथ ही वर्कशॉप की भी मदद लेनी पड़ती है.
आप किरदारों का चुनाव किस तरह करते हैं ?
सबसे पहले मैं निर्देशक का एप्रोच देखता हूँ कि वो उस कहानी को कितनी अच्छी तरह से समझ पाया है. मुझे पता है मैं कोई नहीं हूँ सिर्फ कहानी और स्क्रीनप्ले के हिसाब से अपना किरदार निभाना है. रोल ऐसा होना चाहिए कि सुनने के बाद लगे हाँ मैं इसे करना चाहूँगा और जो करने में मज़ा आए.
शुरुआती दौर में मुंबई में काम पाने के लिए आपको काफी मुश्किलें आई थी ?
मैं किसी के पास काम माँगने नहीं जाता हूँ और मैं बातचीत में भी बहुत अच्छा नहीं हूँ. मैं लोगों को बता नहीं सकता कि देखो मैं क्या क्या कर सकता हूँ. शायद इसीलिए बॉलीवुड से यहाँ तक पहुँचने में मुझे इतना वक़्त लगा. कई बार लोगों ने मुझे सेक्रेटरी रखने की सलाह दी और मैने एक बार कोशिश भी की थी, लेकिन वह काम नहीं आया. जो हुआ अच्छा हुआ, शायद मेरे नसीब में पहले एक मैच्योर अभिनेता और फिर अच्छा मौका मिलना लिखा था.