शुक्रवार, 03 नवंबर, 2006 को 11:02 GMT तक के समाचार
कैलाश बुधवार
लंदन से
कला का देवता
उमड़ रहा है कोटि-कोटि जन की श्रद्धा का सागर
रंगमंच की तपोभूमि पर उतरे तुम नटनागर
ललक रहा है तुमपर धरती की महिमा बड़भागी
छूकर तुमको कला-अहित्या की पाषाणी जागी.
अभिनव जनक ललित संस्कृति के! दरश विदेह तुम्हारा
तापस! तुम ख़ुद भागीरथि की पतित पावनी धारा.
रहे मसीहा फैलाए अपनी करूणा की झोली
पैग़म्बर! तुममें संस्कृति की संत आत्मा बोली.
पुण्य मनुज के! तुम विंरचि की अनहोनी अभिलाषा
सत्यं शिवं सुंदरं की तुम बने स्वयं परिभाषा.
संजीवनिधारी! निष्ठा में हृदय तुम्हीं ने चीरा
लीन हुई तुममें लीलाधर! स्वयं कला की मीरा.
3 नवंबर 1960, (पृथ्वीराज कपूर अभिनंदन ग्रंथ में प्रकाशित)