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बुधवार, 25 अक्तूबर, 2006 को 09:16 GMT तक के समाचार

दुर्गेश उपाध्याय
मुंबई से

'डॉक्टर अंबेडकर- एक अनकहा सच'

जब्बार पटेल की फ़िल्म है ‘डॉ बाबासाहब अंबेडकर-एक अनकह सच.’

इस फ़िल्म में निर्देशक ने बाबासाहब के पूरे जीवन को और उनके सिद्धांतों को बड़ी बारीकी से दिखाने की कोशिश की है.

ये पूछे जाने पर कि इस फ़िल्म को बनाने का विचार उनके दिमाग में कैसे आया.

पटेल कहते हैं, ''हम सब जानते हैं कि भारतीय स्वतंत्रता में बड़े-बड़े नेताओं की अपनी भूमिका रही, लेकिन सामाजिक न्याय के संदर्भ में बाबासाहब का अमूल्य योगदान है.''

वे कहते है,'' बाबासाहब का जीवन संघर्षों से भरा है. इतना अधिक पढ़ा-लिखा होने के बावजूद एक दलित होने के नाते उन्हें ढेर सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.''

इतने बड़े और ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर फ़िल्म बनाने में जब्बार पटेल को काफ़ी बातों का ध्यान रखना पड़ा.

ऐसे गंभीर विषय पर फ़िल्म बनाने के लिए सबसे ज़रूर चीज़ है सही स्क्रिप्ट, जिसके लिए उन्हें और उनकी टीम को काफ़ी समय लगा.

बाबासाहब से जुड़ी जानकारियाँ और तथ्य जुटाने में मशहूर इतिहासविद् डॉ वाईडी फड़के और उनकी टीम ने पूरा सहयोग दिया.

कड़ी मेहनत

पाँच साल की मेहनत के बाद ये काम पूरा हो सका. निर्देशक कहते भी हैं,'' पाँच साल तक बड़ी बारीकी और मेहनत के साथ डॉ फड़के और उनकी टीम ने इस फ़िल्म के लिए शोध किया. हमने सारे पहलुओं पर गंभीरता से काम करने की कोशिश की है.''

इस फ़िल्म के बनने में कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल और इकॉनॉमिक्स ने भी पूरा सहयोग दिया है. बाबासाहब ने अपनी उच्च शिक्षा यही से ग्रहण की थी.

लेकिन पटेल बताते हैं कि सबसे मुश्किल काम था उस शख्स का चुनाव करना जो बाबासाहब के किरदार को परदे पर खूबसूरती से निभा सके.

अंत में ये तलाश पूरी हुई दक्षिण के सुपरस्टार और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित ममूटी के जरिए.

जब्बार पटेल खुश होकर कहते हैं,‘‘ममूटी ने बाबासाहब के किरदार को बड़ी सहजता से निभाया है.’’

फ़िल्म की शूटिंग में उन्होंने सौ दलित लोगों का भी सहयोग लिया है. स्थिति ऐसी हो गई थी कि ममूटी को बाबासाहब के किरदार में देखकर और उनके शानदार अभिनय से कई लोग रो पड़े.

राजनीतिज्ञों में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण अडवाणी और शरद पवार जैसे लोगों ने इस फ़िल्म की तारीफ़ की है.

पटेल कहते हैं,''गाँधीजी ने भारतीयों से अछूतों के लिए अपने दिल को बदलने की बात की, जबकि बाबासाहब राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव लाकर दलितों को सम्मान दिलाने की वकालत की.''

फ़िल्म को बनाते समय इस बात का ख्याल पटेल ने रखा है कि ये फ़िल्म अंतरराष्ट्रीय मानकों पर पूरी तौर से खरी उतरे.

फ़िल्म को बनाने में क़रीब 10 करोड़ की लागत आई है. जैसा कि पटेल स्वीकार करते हैं,'' हमने पूरी कोशिश की कि स्क्रिप्ट के फ़िल्मांकन में कहीं से कोई कमी न रह जाए.''

ये पूछे जाने पर कि क्या ये फ़िल्म आज की युवा पीढ़ी का ध्यान अपनी तरफ खींच पाएगी, वो जवाब देते हैं,'' आजकल हमारे समाज में आरक्षण को लेकर तमाम बातें हो रही हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि युवा वर्ग इस फ़िल्म के जरिए बाबासाहब के व्यक्तित्व और उनके विचारों से अच्छी तरह से परिचित हो सकेगा. इसलिए मुझे लगता है कि नौजवानों के लिए ये फ़िल्म ज़रूरी है.''

पटेल फ़िल्म की कामयाबी को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं.