गुरुवार, 19 अक्तूबर, 2006 को 12:27 GMT तक के समाचार
यश मालवीय
घर में ही घर चुप रहते हैं
नींव के पत्थर चुप रहते हैं
हम तो अक्सर चुप रहते हैं
खिड़की दरवाज़े दीवारें
देखें खिंची हुई तलवारें
डोला करती हैं छायाएँ
घर में घर चुप रहते हैं
अबाबील सी हर सच्चाई
दिखकर छुप जाती ऊँचाई
ख़ुद हैरत में हैं तकरीरें
बाहर भीतर चुप रहते हैं
रेतघड़ी सुनसान सजाए
सिर्फ़ रात का समय बजाए
खाते हैं धोखे पर धोखा
आँसू पीकर चुप रहते हैं
सड़क पहाड़ों की ज्यों टूटे
सपने पड़ जाते हैं झूठे
ये कैसा मौसम आया
मस्त कलंदर चुप रहते हैं
पानी का खारापन चखते
साहिल मुँह पर ऊँगली
लहरों की सीना ज़ोरी पर
नदी समंदर चुप रहते हैं
पर्वत सागर नदियों झीलों
चलते जाते मीलों मीलों
सबसे जीते ख़ुद से हारे
कई समंदर चुप रहते हैं
जलती बुझती हैं कंदीलें
चुभती सन्नाटे की कीलें
मन कुछ कहता नहीं कि मन में
उठे बवंडर चुप रहते है
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पानी भी धुआँ देने लगा
प्यास के हर प्रश्न पर सूखा कुआँ देने लगा
आग की क्या बात, पानी भी धुआँ देने लगा
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युग पुरूष, युगबोध के और हुए दीखे
भीड़ में चुप रहे पर सुनसान में चीख़े
मौत का डर मगर जीने की दुआ देने लगा
बस जंयती, पुण्यतिथियों में उमर बीती
किस घड़ी में कलेंडर से दोस्ती की थी
वक़्त नंगा तार बिजली का छुआ देने लगा
‘लोनमेला’ देख सब मेले हुए फीके
उस तरह मर लिया, मर लो इस तरह जी के
जो नहीं था, क्लास अपना बुर्जु़आ देने लगा
हो रहा जो, कभी उसकी भी वजह देखो
आँख जल जाए न सपने इस तरह देखो
स्वयं को आवाज़ बूढ़ा ‘हरखुआ’ देने लगा.
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