सोमवार, 16 अक्तूबर, 2006 को 05:06 GMT तक के समाचार
शालिनी जोशी
देहरादून से
बुकर पुरस्कार विजेता किरण देसाई की माँ और प्रख्यात लेखिका अनीता देसाई अपनी बेटी को मिले सम्मान से फूली नहीं समा रही हैं.
खुद अनीता देसाई को भी तीन बार बुकर के लिए नामांकित किया जा चुका है लेकिन हर बार वो काफी नजदीक पहुँचकर भी इस पुरस्कार को पाने से रह गईं.
देहरादून में अपने भाई से मिलने आईं अनीता देसाई कहती हैं, "खुशी तो है ही लेकिन उससे ज्यादा मुझे गर्व का एहसास हो रहा है. एक माँ होने के नाते मुझे किरण के लिए चिंता हो रही थी. पिछले आठ सालों से उसने जो कड़ी मेहनत की है और लेखक के जिस एकांत को जिया है मैं उसकी साक्षी हूँ."
माँ और बेटी में तुलना स्वाभाविक सी बात है और ख़ास तौर पर जब दोनों लेखिका हों.
लेकिन अनीता कहती हैं, "किरण ने अपनी अलग शैली विकसित की है वो रचनात्मक लेखन की पढ़ाई भी कर रही है. हमारी किताबों के विषय में कुछ समानता भले ही दिखे क्योंकि हमारे अनुभव मिलते-जुलते हैं."
किरण कई मौकों पर ये कह चुकी हैं कि उनकी माँ नहीं चाहती थी कि वो लेखिक बने.
ये पूछे जाने पर कि क्या ये सच है अनीता देसाई हँस पड़ती हैं, "किरण में लिखने की प्रतिभा है वास्तव में इसका एहसास मुझे उसके स्कूल में ही हो गया था और उसके शिक्षकों ने भी उसे प्रोत्साहित किया."
तो फिर इसका मतलब ये है कि किरण को लेखनी विरासत में मिली है, "नहीं, मैं कहूँगी दोनों ही. उसने बचपन से मुझे पढ़ते-लिखते ज़रूर देखा है लेकिन अपने-आपको खुद माँजा है और उसकी लिखने की कला उसकी ख़ुद की मेहनत से ही परवान चढ़ी है."
किरण के बचपन के दिनों को याद करती हुई अनीता देसाई बताती हैं, "बचपन से ही स्कूल के बाद जैसे किताबें ही उसकी साथी थीं. चिट्ठियाँ लिखना उसे खूब भाता था.15 साल की थी जब हम अमरीका चले गए. उसने पूरब और पश्चिमी जीवन के फर्क़ और जटिलताओं को करीब से देखा और समझा है."
किरण ने अपनी पुरस्कार प्राप्त कृति 'इनहेरिटेंस ऑफ़ लॉस' अपनी माँ को ही समर्पित की है.