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शुक्रवार, 13 अक्तूबर, 2006 को 10:25 GMT तक के समाचार

वेदिका त्रिपाठी
मुंबई से

सँवारा सबसे रोशन सितारों को

फ़िल्म इंडस्ट्री ऐसे सितारों की कोई कमी नहीं जिन्होंने एक्टिंग मास्टर रोशन तनेजा से अभिनय के गुर सीखे हैं.

माहिर माने जाने वाले कलाकार ओम पुरी, नसीरूद्दीन शाह, जया बच्चन, शबाना आज़मी हों या फिर नए ज़माने के कलाकार अभिषेक बच्चन, अजय देवगन और रानी मुखर्जी...

रोशन तनेजा फ़िल्म नगरी में एक्टिंग गुरू बनने नहीं आए थे बल्कि अपने आपको एक अभिनेता के रूप में स्थापित करने आए थे. लेकिन शायद भाग्य को कुछ और ही मंज़ूर था.

वे कहते हैं, “मैं यहाँ बाक़ायदा अभिनेता बनने आया था. ऐसा नहीं है कि मैं हीरो ही बनने आया था बल्कि एक अच्छा कलाकार बनने आया था. मुझे पता था कि हीरो बनने के लिए मेरे पास कद-काठी नहीं थी”.

‘मियां बीवी राज़ी’, ‘सौतेला भाई’, ‘दिवाला’ जैसी चंद फ़िल्मों में काम भी किया है लेकिन बात बनी नहीं.

रोशन तनेजा पाँच वर्ष अमरीका में रहे और वहाँ अभिनय का प्रशिक्षण लिया, जब लौटकर आए तो पुणे में फ़िल्म इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में एक्टिंग कोर्स शुरू करने की बात चली और रोशन तनेजा को अभिनय सिखाने का काम सौंपा गया.

स्कूल

पुणे फ़िल्म इंस्टीट्यूट से 13 वर्ष तक जुड़े रहने के बाद सन 1976 में उन्होंने ‘एक्टर्स स्टूडियो’ के नाम से अपनी एकेडमी खोली. संयोग से पहले ही बैच में अनिल कपूर, गुलशन ग्रोवर, सुभाष घई, असरानी आदि जैसे कलाकार शामिल हो गए.

सुभाष घई के बारे में वे कहते हैं कि “वह तो अभिनेता बनना चाहते थे लेकिन देखिए जो क़िस्मत में लिखा होता है वही होता है”.

पुणे फ़िल्म इंस्टीट्यूट के दिनों को वे याद करते हैं, “जया बच्चन जिसमें टैलेंट तो था लेकिन दिखने में कुछ ख़ास नहीं थी. स्कूल में एकदम मामूली लड़की लगती थी लेकिन अपनी मेहनत और लगन से जया ने अपनी एक पहचान बना ही ली”.

उनके पास साल दर साल हीरो-हीरोइनों का बैच आता रहा जिन्हें वे अभिनय सिखाते रहे, जिनमें माधुरी दीक्षित, अजय देवगन, संजय दत्त, सनी देओल, अभिषेक बच्चन, रानी मुखर्जी आदि शामिल हैं.

अभिनय सिखाने के तरीक़े के बारे में तनेजा बताते हैं, “हमारे यहाँ रियाज़ का एक तरीका है इंप्रोवाइज़ेशन का. इसमें मकसद, मोटिवेशन, क्या जगह है, क्या वक़्त है आदि के बारे में बारीकी से समझाया जाता है”.

वे कहते हैं, "अगर आप ज़्यादातर फ़िल्में देखेंगे तो रिश्तों पर ही आधारित होती है. आम तौर पर शुरूआत यहाँ से होती है कि वक़्त, जगह, रिश्ता आदि क्या है."

तनेजा का कहना है, "कई बार सीन करते करते कलाकार सचमुच रोने लगता है क्योंकि वह किरदार में इस कदर खो जाता है कि उसे लगता है कि वह उसके साथ हो रहा है."

नया ज़माना

वे मानते हैं कि इंसान के अंदर अगर काम करने की लगन और मेहनत करने का ज़ज़्बा हो तो उसे कोई नहीं रोक सकता है. रानी मुख़र्जी के बारे में बताते हैं कि "उसे अपने बारे में बहुत चिंता थी. उसकी मां बहुत परेशान रहती थी. रानी को लगता था कि उसकी आवाज़ कैसी है, उसकी आँखें कैसी है लेकिन आज उसकी वही आँखें, वहीं आवाज़ उसकी पहचान बन गई है."

तनेजा आजकल के कलाकारों की बात करते हुए कहते हैं, “आजकल के लोगों में काम करने की ललक नहीं है. आजकल के लिए लोगों को सब कुछ जल्दी चाहिए. डेडिकेशन, सब्र नाम की कोई चीज़ ही नहीं है”.

वे कहते हैं, "आज तो इस तरह की हालत है कि लोग पूछते हैं कि एक महीने की छुट्टी हो रही है कोई कोर्स है आपके पास...?? कभी-कभी मुझे लगता है कि इनके मां-बाप भी कहते होंगे कि अच्छा जाओ छह महीने, साल भर का कोर्स कर लो, हमारा पीछा तो छूटे."

अभिनेता और अभिनेत्रियों की कई पीढ़ियों को एक्टिंग का गुर सिखाने वाले तनेजा की उम्र ढल रही है लेकिन अब भी वे एक्टिंग की क्लास में लेक्चर देते रहते हैं.

जो काम वे ख़ुद नहीं कर पाए उसे बेहतर ढंग से कैसे किया जाए इसे सिखाने में उन्हें निश्चित रूप से सफलता मिली है, तनेजा कहते हैं, "वही होता है जो क़िस्मत में लिखा होता है."