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शुक्रवार, 13 अक्तूबर, 2006 को 08:06 GMT तक के समाचार

प्रभात त्रिपाठी

एक मासूम दुखांत

कहानी

उसकी नींद तड़के ही खुल गई थी. उसने सुना भी था कि अनु को आवाज़ देकर उठाती हुई माँ बड़बड़ा रही है. उसने जानबूझकर आँखें जोर से मूँद ली थीं और लिहाफ से अपने को पूरा ढाँप लिया था. अनु चुपचाप उठी, पर पता नहीं क्या सोचकर उसने दीदी का लिहाफ खींचकर उसे उघाड़ दिया. ‘‘क्या मज़ाक है?’’ आभा ने थोड़े बड़प्पन वाले गु़स्से में कहा.

इस पर अनु ने सामने के दो दाँत निपोरकर ऐसा चेहरा बनाया कि वह अपने गु़स्से को भूलकर मुस्कुराई. यह कोड था. इसका मतलब था दँतरे तिवारी सर सब्ज़ी लाने को बाज़ार के लिए निकल रहे हैं, और बार-बार, पलटकर उनके द्वार की तरफ देख रहे हैं. आभा लोगों का फ्लैट दूसरी मंजिल पर था. ठीक नीचे ग्राउंडफ्लोर में रहते थे तिवारी जी. देखने में अजीब से लगते थे. कद-काठी में एकदम मरियल और अनुपात में इतना बड़ा सिर, तिस पर बड़े-बड़े दाँत ऐसे बाहर की ओर निकले हुए, कि एक बार देखो तो दोबारा देखने की कसम खा लो. पर वे थे कि जहाँ कोई जवान लड़की बगल से गुज़री कि आँख एकदम से उस पर चिपका देते.

शायद उन्हें सोचकर अनु ने दुबारा ऐसा मुँह बनाया मानो उसने कोई निहायत गंदी चीज़ देख ली हो. आभा ने करवट बदली और सोचने लगी कि अनु कितनी आसानी से चेहरे के भाव बदल लेती है. माँ ने फिर आवाज़ दी. अनु वहीं खड़ी चुपचाप उसकी और ताक रही थी. उसने ज़रा गौर से अनु की ओर देखा तो लगा कि उसका देखना कुछ अलग सा है. पल भर को उसे लगा कहीं अनु को किसी ने वह बात तो नहीं बता दी?

‘‘आख़िर कौन बता सकता है?’’ उसने सोचा, फिर उसे लगा कि वह ख़ुद किसी से सबकुछ कह देने के लिए जाने कब से कुलबुला रही है, पर जब कहने को सोचती हैं तो समझ ही नहीं पड़ता कि आख़िर वह बताएगी क्या? यही कि हरीश उसे अचानक एक दिन मिला था और... इस तरह सोचने पर उसे हमेशा लगता था कि कोई समझ ही नहीं पाएगा क्योंकि बताने लायक कुछ है ही नहीं. ऐसा सोचते हुए उसे अपना सिर थोड़ा भारी लगा. रात देर तक वह इसी तरह ऊटपटांग कितना कुछ सोचती रहती थी. और अनु उसे लगातार कोंचती रही थी कि अगर उसे कुछ पढ़ना-लिखना नहीं है, तो वह बत्ती क्यों नहीं बुझा देती. पर पता नहीं क्यों उसे लगता था कि बत्ती बुझा देने पर वह एकदम अकेली हो जाएगी. और अकेली होने पर फिर वही सब सोचने लगेगी. सोचकर उसे हँसी आई. एक धीमा बेआवाज़ हँसी. मुस्कराने और हँसने के बीच की ऐसी कोई पतली लकीर जिसे कोई दूसरा देख ले तो उसे अजीब सा लगे. कोई दूसरा देख तो नहीं रहा, जैसे किसी ख़याल में वह पलटना चाहती थी कि माँ ने फिर आवाज़ दी. उसका ध्यान टूटा. वह पलटी. उसने देखा कि अनु वहीं खड़ी है और उसकी ओर ताक रही है.
‘‘तू जाती क्यों नहीं?’’ उसने बड़ी बहन वाली झिड़की में कहा.
‘‘नहीं जाऊँगी.’’
‘‘लेकिन क्यों? ’’ उसने थोड़े तेज़ स्वर में कहा. उधर माँ बड़बड़ा रही थी. और वाटर-वर्क्स वालों को कोस रही थी कि कभी तो इतना तेज़ पानी देते हैं कि नल के मुँह पर प्लास्टिक पाइप की टोंटी ही नहीं टिकती. और कभी इतना धीमे कि घड़ा लेकर घंटे भर खड़े रहो तो भी भरता नहीं.
‘‘मुझसे वह काम होगा नहीं, तूने सुतली से टोंटी बाँधने के लिए जिस विधि का आविष्कार किया है ना दीदी, उसके लिए तुझे नोबल प्राइज मिलना चाहिए.’’

‘‘इतवार की छुट्टी का थोड़ा सा आराम तो नहीं मिल रहा है. और...,’’ आभा भुनभुनाई लेकिन उठ गई. पीतल का पुराना घड़ा नल के करीब ले जाने और फिर उठाकर वापस उसी ऊँची जगह पर रखने के झमेले से बचने के लिए ही, पाईप से चारों तरफ पानी पहुँचा दिया जाता था. बाथरूम का नल हमेशा इतने धीमे आता था, सो वहाँ की टंकी भी इसी कायदे से भरी जाती थी. आभा उठी और रसोई वाले पाईप की ओर बढ़ी. अनु पीछे थी, शायद शरारत के मूड में ही, ‘‘ओ हो! कितना हाड़तोड़ परिश्रम कर रही है कु आभा तिवारी एमए सुबह सात नहा धोकर घर से निकलना. फिर एक घंटे बस स्टॉप पर बस का इंतज़ार फिर...’’

आभा ने सुना. आधा वाक्य ही सुनकर उसे सिहरन सी हुई. टोंटी में लगी सुतली को नल के साथ कस कर बाँधती हुई अपने आप को भूलकर उसने देखा उस बीत गए दिन को. स्टॉप के पास का वह पीपल का बूढ़ा निपात पेड़. गर्मी की शुरुआत में ही उसके सारे पत्ते झर चुके थे. वह मार्च की 17 तारीख़ थी. यानी शुरुआत. और अब अक्तूबर का महीना है यह, उसने सोचा और फिर ख़याल को झटक दिया.

हाथ मुँह धोने के बाद वह जब दूसरी तरफ वाली बाल्कनी पर रखी बेत की कुर्सी पर बैठी तो उसे लगा कि वह ठीक है. सिर का भारीपन कुछ कम मालूम हुआ. भीतर के हल्केपन को छूने के लिए उसने आसमान की तरफ देखा और उसकी नज़र बस स्टॉप के पीपल पर पड़ी. इतनी दूर से सिर्फ़ उसकी फुनगियाँ दिखती थीं. उसे अच्छा लगा और उसने सोचा कि वह फिज़ूल ही परेशान हो रही है. अव्वल तो ऐसी कोई बात ही नहीं है, और अगर है, तो उसे पापा से ही बात कर लेनी चाहिए. अपने इस निर्णय से उसने राहत के अलावा एक फुरपुराती सी उत्तेजना भी महसूस की. उसके मन में अपने आप वाक्य बनने लगे. और उसे लगा कि वह सचमुच पापा से बात कर रही है.
‘‘पहले दिन तो उसने कोई बात ही नहीं की.’’
‘‘हूँ’’
‘‘और दूसरे दिन...’’
‘‘क्या कोई जासूसी क़िस्सा है?’’ उसे लगा कि उसकी सारी बात को पापा मज़ाक में टाल सकते हैं क्योंकि बात ही ऐसी थी. निहायत फ़िल्मी, बल्कि ठीक-ठाक ढंग से फ़िल्मी भी नहीं. थोड़े में सोचो तो सिर्फ़ यही कि बस का इंतज़ार करते-करते हरीश से उसका परिचय हुआ था. फिर कुछ ही दिनों में वे बस के साथ-साथ एक दूसरे का इंतज़ार करने लगे थे. और फिर एक दिन भीषण गर्मी की बोरिंग सुबह के वक़्त इंतज़ार से थक कर हरीश ने प्रस्ताव किया ‘‘चलिए चलकर कहीं आइसक्रीम खाते हैं.’’
वह चौंक गई‘‘आइसक्रीम!’’
‘‘हाँ,’’ उसने कहा. वह मुस्कुरा रहा था. पतले होठों पर तरतीब से कटी बारीक मूँछ के बीच वह मुस्कान चमक सी रही थी,‘‘लेकिन आप इस तरह चौंक क्यों गईं?’’
इस बार वह मुस्कुराई. उसे लगा उसके भीतर कोई ठंडी चीज़ सरसरा रही है. हरीश अब तक उसके लिए लगभग अजनबी था. थोड़ी देर के लिए होनेवाली इन मुलाकातों में उन्हें इतना वक़्त नहीं मिला था, कि वे एक दूसरे के बारे में रस्मी परिचय से ज़्यादा कुछ जान सकें. पर अभी वह उसी तरह मुस्कराती हुई बोली,‘‘मैं भी आइसक्रीम के बारे में सोच रही थी.’’

‘‘सोच रही थीं?’’ उसने नकली आश्चर्य के भाव में कहा,‘‘इसमें सोचने को क्या है, आइसक्रीम के बारे में चिंतन!’’
वह खुल कर हँसी. गर्म हवा के झोंके में उसके रुखे बाल फरफराए. चेहरे पर आ गए. उसने पलांश के लिए उन्हें वैसे ही रहने दिया. और बालों के भीतर से उसकी तरफ देखा. वह दूसरी तरफ देख रहा था, या शायद कुछ सोच रहा था. उसने हल्के हाथों से बाल सहेजे और चल पड़ी, दोनों पास के रेस्तराँ में जा पहुँचे. भीतर पंखे की ज़रूरत महसूस हो रही थी.

हरीश ने मर्द होने की जिम्मेदारी पूरी करते हुए मुस्तैदी के साथ आवाज़ दी,‘‘पंखा तो चलवाइए भाई साहब.’’
पंखा चला. खुरदरे चेहरे वाला अठारह-बीस साल का एक लड़का उनकी टेबल के पास आकर खड़ा हो गया.
‘‘आइसक्रीम है? हरीश ने पूछा जबकि आभा अजब अनमनी नज़रों से होटल का मुआयना करने में लगी थी.
‘‘सॉफ्टी है’’ लड़के ने कहा.
‘‘दो’’

लड़का चला गया. कुछ ही पलों में सॉफ्टी लेकर लौटा. ख़त्म करने के बाद जब वे उठने लगे तभी हुई थी, वह घटना. यानी वह सिहरन. जो उसकी पतली चमकती मुस्कान से निकलकर आभा की गर्म देह में ठंडक की तरह सरसरा गई थी. अब जैसे दुबारा वापस आ गई. उसने टेबल पर रखी आभा की हथेली पर अपनी हथेली रख दी. पल भर की उस सुंदर अदृश्य सिहरन का मतलब जानने के लिए उसने चेहरा उठाया, तो वह उसी तरह मुस्करा रहा था. ना, उसी तरह नहीं, क्योंकि अब की उसे अच्छा नहीं लगा. उसके मुस्कराने में महज एक शालीन शिष्टाचार जैसा कुछ था और यह उस वाक्य में भी था, जो उसने कहा,‘‘अब एक आपकी तरफ से’’ ‘‘मेरी तरफ से,’’ उसने अपने को नशे की सी उस सिहरन की गिरफ़्त से मुक्त करते हुए कहा, ‘‘आइसक्रीम का प्रपोज़ल तो आपकी तरफ से था.’’

दृश्य याद करके वह हँसी. जब स्मृति टूटी तो सामने माँ थी.
‘‘चाय ठंडी हो रही है.’’ माँ ने रूखे स्वर में कहा. वह काफ़ी देर से शायद वहीं खड़ी थी. लेकिन क्यों? जानने के लिए उसने माँ की तरफ दुबारा देखा. तब वह झाड़ू लगाना शुरू कर चुकी थी.

‘‘क्या आज शांता बाई नहीं आई’’?
‘‘आज इतवार है,’’ माँ ने पूर्ववत रुखाई से कहा. इस पर आभा को याद आया कि इतवार को वह नहीं, उसकी बेटी रत्नी आती है.
‘‘पर रत्ना’’?
माँ मुँह बिदकाकर परे हो गई. उसे याद आ गया. अभी परसों ही उसे शांता बाई ने बताया था. खुश थी वह,‘‘जात-पाँत में क्या रखा है बिटिया दोनों एक दूसरे को चाहते हैं तो और क्या चाहिए.’’

अभी हफ़्ता भर पहले ही रत्ना ने प्रेम विवाह किया था, लेकिन यही बात अगर माँ बताती तो कहती,‘‘शांता बाई की लड़की किसी मुसलमान लड़के के साथ भाग गई.’’

‘भाग गई’, और ‘मुसलमान लड़का’ इन्हीं दो बातों पर उसका ज़ोर होता. पापा सुनते तो पहले ठहाका लगाते और माँ को चिढ़ाते,‘‘अगर तुम्हारी बिटिया किसी क्रिस्तान के साथ भाग जाए तो?’’

कल्पना में माँ की नाराज़गी का दृश्य चल ही रहा था. तभी उसकी नज़र अनु पर पड़ी. वह पापा के कमरे के दरवाज़े पर खड़ी चुप रहने के इशारे के साथ आभा को बुला रही थी. आभा सहज उत्सुकता के साथ आगे बढ़ी और जाकर देखा तो अनायास ही उसे हँसी आ गई.

पापा सोकर उठते ही पद्मासन में बैठ गए थे और आँख मूँदे योगाभ्यास कर रहे थे. फिर उन्होंने एक नाक बंद की और साँस खींचने छोड़ने वाला अभ्यास शुरु किया तो नज़र तोंद पर पड़ी, जो फूलती पिचकती एक अजीबोगरीब चीज़ लग रही थी. अब अनु अपनी हँसी नहीं संभाल सकी. आभा की मुसकराहट भी खनखाने सी लगी. धारीदार अंडरवियर पहने तुंदियल पापा योगाभ्यास की मुद्रा में बिल्कुल जोकर लग रहे थे. अनु की खिल-खिल सुनकर उन्होंने आँखे खोलीं और फिर दुबारा एक आँख दबाकर कहा,‘‘डोंट डिस्टर्ब मी. देखती नहीं मैं हायपर टेंशन की दवा खा रहा हूँ.’’

‘‘ओह पापा! यू आर सो स्वीट. अंडरवियर में योगा करते हुए तुम बहुत फनी लग रहे थे, फिर करो ना...’’ कहती हुई अनु उनसे लिपट गई. आभा का भी मन हुआ कि वह जाकर पापा से लाड़ करे, लेकिन उसकी देह में फिर से वह बेचैन कर देनेवाली सिहरन सरसराने लगी थी. पल भर को उसकी आँखों के सामने हरीश का चेहरा उभरा. हमेशा की तरह अर्थहीन ढंग से मुस्कुराता हुआ. उसे लगा कि हरीश के मन में उस तरह का कोई भाव नहीं है. यह उसका दुःख था. एक अबूझ बेचैनी की तरह का, जो थोड़ी ही देर में गायब हो जाएगा.

‘‘क्या बात है आभा?’’ पापा ने पूछा. उनका स्वर गंभीर था. वे उसके क़रीब आ गए थे.
‘‘कुछ तो नहीं,’’ उसने थोड़े संकोच के साथ कहा. इस तरह अचानक अपना अन्यमनस्क हो जाना ख़ुद उसे अच्छा नहीं लगा, पर यह बिल्कुल अपने आप हो गया था. पापा को लाड़ करती अनु को देखकर वह अपनी चाह के सपने में डूब गई थी, और उसे खयाल भी नहीं रहा, कि वह पापा के कमरे में है. खड़ी है और चुपचाप सामने की ओर ताक रही है. ताक रही है, और दीवार को तोड़कर उसी आँख वहाँ चली गई है. उसी जगह पर. सोचकर उसे लाज की झुरझुरी सी हुई. या शायद पापा के स्पर्श की. इस बीच उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया था और उसके बाल सहलाने लगे थे,‘‘कोई ख़ास बात है आभा?’’
उसने सिर उठाया. पापा की आँखों में सचमुच गंभीरता थी, लेकिन क्या ऐसे में कही जा सकती है, वो बात? और फिर बात भी क्या है? उसने शायद हज़ारवीं बार सोचा और ख़ुद पर लानत भेजते हुए पापा को आश्वस्त किया,‘‘ओह नथिंग पापा, मैं यूँ ही ज़रा सोचने लगी थी.’’

‘‘लेकिन क्या?’’ पापा ने उसकी आवाज़ की नकल उतारने सा कहा. फिर बाथरूम की तरफ बढ़ गए. वे अब आश्वस्त थे, और वह अकेली. सामने छुट्टी का पूरा दिन था. इस समय सुबह के सिर्फ़ नौ बजे थे. घड़ी की ओर देखते-देखते वह वक़्त काटने की योजना बना रही थी, कि उसे शकुन की याद आई. उसी पल उसने तय कर लिया कि वह शकुन के यहाँ ही जाएगी. इस निश्चय के साथ वह अपने कमरे में घुसी. देखा. लिहाफ ओढ़ कर खाट पर बैठी अनु गुमसुम होकर पंखे के ऊपर बैठी गौरइया को ताक रही है.

‘‘तू ने ब्रश कर लिया?’’ उसने पूछा. जवाब में अनु ने उसकी तरफ देखर मुँह बनाया,‘‘हम तो भई उस मुहावरे को मानते हैं, कि शेर भी कभी मुँह धोता है.’’

ये पाठक अंकल थे. मोटी भर्राई आवाज़ वाले पाठक अंकल की याद से वह फिर थोड़ा अथिर हो गई. उस दिन पाठक अंकल रात को यहीं रुके थे. रात देर तक वे आभा से बातें करते रहे थे. उनके सोने के लिए अनु की खाट बाहर के कमरे में बिछा दी गई थी. अंदर अनु और आभा साथ-साथ सोए थे. यह कोई नहीं बात नहीं थी. पर उस रात के किसी प्रगाढ़ स्वप्निल आवेश में कुछ ऐसा हो गया था, कि सोचो तो अभी भी लाज लगती है. एक धीमे बहते सपने में पार्क की बेंच पर बैठी वह चुपचाप सामने झील के हल्के लहरीले विस्तार की ओर एकटक निहार रही थी कि अचानक हरीश उसके पीछे आकर खड़ा हो गया था. पहले अपने कंधों पर उसने उसके हाथों का स्पर्श महसूस किया. फिर उसे लगा था कि हरीश ने अपनी बाहों में भी भींच लिया है. और फिर लगा कि ना, हरीश नहीं. ये पाठक अंकल हैं. फिर एक अजीब सी सरसराहट. फिर धौंकनी सी चलती साँसों की मीठी बेहोशी के बीच, उसने अनु को अपने से लिपटा लिया था. एक सुख भरी दहशत में उसने आँखे खोलीं और देखा कि मगन सोई अनु के सीने पर उसका हाथ श्लथ(शलथ) पडा हुआ है.
उसी दिन से उसकी बेचैनी बढ़ गई थी. ये अजीब सी बेचैनी थी, जो लाख कोशिश करने पर भी उसके चेहरे से ज़ाहिर हो ही जाती थी. और ज़ाहिर होते ही कोई अजनबी भी उसे पकड़ लेता. उसे लगता लोग उसके सपनों के चारों तरफ घूरती आँखों से घूम रहे हैं. उसे अकारण शर्म और संकोच की ऐसी अजीब अनुभूति होती कि वह कुछ कह नहीं पाती. सपने वाले दिन ही सबसे पहले मिसेज माथुर से उसे टोका था कि मिस तिवारी आज आप बड़ी उड़ी-उड़ी सी लग रहीं हैं. और थोड़ी ही देर बाद जब शकुन ने पूछा था कि वह आज इतनी खोई-खोई सी क्यों है, तब तो वह और विकल हो गई थी. जैसे अभी. छुट्टी के लंबे खाली दिन अपनी कुलबुलाहट के लिए घर में पड़े रहने की कल्पना ही उसे इतनी थका देने वाली लगी कि उसने दुबारा सोचा कि क्यों न शकुन से ही बात कर ली जाए. यह निर्णय भी पल भर में उड़ न जाए, सोचकर उसने सपाटे से कपड़े बदलना शुरू कर दिया, तभी माँ कमरे में आई,‘‘क्या आज भी कहीं जाना है.?’’

‘‘आज शकुन के साथ पिक्चर का प्रोग्राम है,’’ उसने बिना सोचे झूठ कह दिया. पल भर के लिए उसे हैरत हुई और बुरा भी लगा. इसलिए दुबारा जब अनु ने पूछा कि क्या वह इंग्लिश फ़िल्म देखने जा रही है, तब वह अपने झूठ पर कायम नहीं रह सकी.
‘‘ना,’’ उसने कहा, ‘‘पिक्चर का अभी कुछ ठीक नहीं है’’ और इसके बाद सपाटे से वह घर से बाहर निकल गई.

शकुन के घर पहुँचते ही उसे लगा कि बेकार चली आई वह. वहाँ सारे लोग व्यस्त थे. कहने को तो शकुन के मामा और उनके कोई मित्र खाने पर निमंत्रित थे, पर तैयारी देखकर लगा कि कोई विशेष आयोजन है. उसने शकुन से पूछा भी, तो उसने टालने के लहज़ में जवाब दिया. आभा को लगा शकुन कुछ छिपा रही है, पर उसने आगे ज़्यादा कुछ नहीं पूछा. वह मुड़ी तो उसकी नज़र सामने के कमरे में नौकर से क्रॉकरी उतरवाते दीपक पर पड़ी. आभा को देखकर वह भी मुस्कराया. शकुन से बगैर कुछ बोले वह उसकी तरफ बढ़ी. आभा को पास आती देख उसने कहा, ‘‘तुम्हारे ही यहाँ से आ रहा हूँ.’’
आभा ने पूछने सा उसकी तरफ देखा.
‘‘तुम्हे ख़बर कहाँ से लगी?’’ दीपक ने सहज भाव से पूछा.
‘‘मतलब? आभा ने थोड़े आश्चर्य के स्वर में कहा.
‘‘यू मीन, तुम ये नहीं जानतीं कि आज शकुन की सगाई है!’’
‘‘ओह,’’ उसने कहा. तब उसकी समझ में आया कि शकुन लाज-शरम के नाटक जैसी छिपाने और बताने की मुद्रा क्यों बनाए थी. अचानक उसे नरेंद्र की याद आई. कॉलेज के दिनों में नरेंद्र के साथ शकुन ने अफेयर की चर्चा सबसे महत्वपूर्ण सनसनी थी. फिर बीए के बाद नरेंद्र कहीं बाहर चला गया था. ‘‘क्या शकुन को उसकी याद आती होगी? आभा ने सोचा.
‘‘तुम रुक रही हो ना?’’
‘‘ओह नो,’’ आभा ने थोड़ा लहराकर कहा. ‘‘छुट्टी के दिन बुजुर्गों के स्वागत-सत्कार में जाया करने का अपना मूड नहीं है.’’
‘‘क्या कहीं कोई युवा कार्यक्रम है?’’ दीपक हँसा. वह सोच भी नहीं सकता था कि शायद हो. उसने यूँ ही कहा था यह वाक्य. पर आभा के मन में कुछ और कहीं खिलता सा लगा और वह मुस्कराई. दरवाज़े की तरफ बढ़ती हुई बोली, ‘‘तुम ज़रा शकुन को समझा देना.’’

‘‘उसे तुम्हारा ख़याल नहीं आएगा.’’ दीपक हँसते हुए बोला.
‘‘और तुम्हारा?’’ वह भी हँसी.

प्रतिक्रिया में दीपक के चेहरे पर कौन से भाव आए यह देखने की कोशिश उसने नहीं की. कुछ ही पलों में वह सड़क पर थी. और कुछ ही मिनटों में वेरायटी स्क्वेयर पर. फिर वहाँ से यूनिवर्सिटी की ओर जाते हुए अचानक उसके मन में ख़याल आया कि इतवार के दिन भी उसके पैर अनजाने ही यूनिवर्सिटी वाले रास्ते पर बढ़ गए हैं. वह चाहती तो सदर की सड़क पर भी जा सकती थी. उसी रस्ते पर थोड़ी ही दूर पर हरीश का कमरा भी था. सोचकर उसे अजीब सा लगा. घूमघामकर उसका दिमाग किसी भी तरह हरीश की तरफ बढ़ जाता था. शायद इसकी वजह यह भी थी कि पिछले चार-पाँच दिनों से हरीश बस स्टॉप पर नहीं मिला था. सोच में हल्की शर्म की सिहरन आभा की देह में बिखर गई. क्या पता उसने मकान बदल दिया हो, यह सोचते हुए उसके मन में दुबारा यह बात आई कि चलके हरीश को देख लेना चाहिए, पर यह सिर्फ़ उड़ते ख़याल जैसी बात थी. वह उसका मकान नंबर तो जानती थी लेकिन ऐसा सोचना भी उसे अनैतिक और अटपटा लगता था कि कोई लड़की ख़ुद होकर लड़के के कमरे में जाए और वह भी बिना बुलाए.

जाने का सवाल भी अब नहीं उठता था. वह यूनिवर्सिटी वाली सड़क पर काफ़ी दूर निकल आई थी. धूप तेज़ नहीं थी, पर तेज़ चलने की वजह से थकान सी महसूस हो रही थी.

अचानक उसकी नज़र किंही भारत के विख्यात ज्योतिषी की बेछत फुटपाथी दुकान पर पड़ी. उसके मन में हाथ दिखाने का ख़याल आया. ज्योतिषाचार्य की पारखी आँखों ने ग्राहक का मन ताड़ लिया. वे गंभीर स्वर में बोले,‘‘सात पुश्तों की हमारी विद्या है बहन जी, आइए आइए.’’

वह थोड़ा सकुचाते हुए जब मोढे पर बैठी तो बगल से गुज़रते एक अधेड़ सफेदपोश अचानक ठिठक सा गए. आभा से उनकी आँखें मिलीं. उन्होंने अपनी आँखे फिरा लीं, और चुपचाप अपने रस्ते आगे बढ़ गए. उसके बाद कई लोग वहाँ ठिठके, पर उनकी ओर देखे बिना इत्मीनान से मोढे पर बैठी आभा ज्योतिष महाराज की भूत-भविष्यवाणियों पर सिर हिलाती रही. अचानक उसके मन में आया कि इतनी देर से महाराज ने उसकी शादी के बारे में कुछ नहीं बताया है. इस ख़याल के पीछे एक दूसरा ख़याल था. आभा ने इस दूसरे ख़याल के बीच से झाँकते चेहरे को परे करने की कोशिश में सिर उठाकर ज्योतिष महाराज की ओर देखा.

हथेली से आँख हटाकर ज्योतिष उससे मुखातिब हुआ,‘‘विद्या! विद्या तो आपके हाथ में अपार है देवी जी. आप ऊँची से ऊँची विद्या प्राप्त करेंगी. विद्या के कारण...’’

आभा ने एक झटके से अपनी हथेली खींच ली. फिर पाँच रुपए का नोट ज्योतिषी जी की तरफ बढ़ाती हुई नाटकीय स्वर में बोली,‘‘कृपा कीजिए महाराज, इस ऊँची से ऊँची विद्या को छोड़कर और चाहे जो प्राप्त करा दीजिए, लेकिन विद्या...’’

ज्योतिषाचार्य हकबकाए से उसके सुंदर चेहरे की ओर ताकते रहे और जब वह उठकर जाने लगी, तो देर तक उसकी पीठ को निहारते रहे.

जिस दिशा से आई थी, उसी दिशा की ओर वापस जाती आभा के मन में वैसी कोई बेचैनी तो नहीं थी, पर एक ऐसा खालीपन ज़रूर था, जिसके चलते घूमने-भटकने की इच्छा मर गई थी. घर में चुपचाप पड़े रहने की सोचकर उसने आगे कदम बढ़ाए. कुछ ही देर में वह अपने ही घर के दरवाज़े की घंटी का स्विच दबा रही थी. ऐसा करते हुए वह थोड़ा ठिठकी और अनु ने दरवाज़ा खोलते ही पूछा,‘‘पिक्चर नहीं गई?’’
‘‘ना,’’ उसने धीरे से कहा.

दरवाज़ा बंद करने के बाद अनु उसके पीछे थी. सामने पाठक अंकल और पापा थे. बिसात बिछी हुई थी. वे दोनों बिल्कुल मगन थे. उन्हें आभा के आने की ख़बर तक नहीं हुई. पीछे आती अनु ने कहा,‘‘तुम्हारे नाम कोई शादी का निमंत्रण कार्ड दे गया है.’’
आभा चौंकी पर प्रगट रूप से उसने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई. झोला फेंककर बिना कपड़े बदले चुपचाप खाट पर लेट गई. अनु ने उसकी तरफ लिफ़ाफ़ा बढ़ाया. उसने खोला और पढ़ा,‘‘हरीश वेड्स नमिता’’ पलांश के लिए उसका जी धक से हो गया, लेकिन इसका भी कोई पता उसने नहीं चलने दिया.
‘‘कौन दे गया था?’’ उसने पूछा.
‘‘फोर्थ फ्लोर से श्रीवास्तव जी के यहाँ का पिंटू आया था.’’ आभा ने सुना. चुप रही. अनु ने फिर पूछा,‘‘किसका है?’’
‘‘एक दोस्त का.’’ आभा ने कहा और करवट बदलकर चेहरा घुमा लिया. अनु और कुछ पूछना चाहती थी, पर चुपचाप वापस चली गई. दीदी के छिपे चेहरे के भीतर खिल आए दुख के नन्हे फूल को वह नहीं देख पाई. घर में कोई भी नहीं जान पाया कि आभा अचानक कितनी बड़ी हो गई है. अभी. इस पल.
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