गुरुवार, 12 अक्तूबर, 2006 को 21:27 GMT तक के समाचार
उपन्यास अंश
वरिष्ठ कथाकार हृदयेश ने इधर आत्मकथा पूरी की है.
आत्मकथा मुख्यतः हृदयेश के जुनून में नंगे पाँव तय किए गए अदबी सफ़र का लेखा-जोखा है. इसे उन्होंने अन्य पुरुष में लिखा है. दिए गए कथा के संस्पर्श तथा औपन्यासिक विन्यास के कारण यह अपने में उपन्यास का आस्वाद लिए हुए है.
‘तनी हुई रस्सी’ के शीषर्क से आत्मकथा को अभी पुस्तक रूप में प्रकाशित होना है. प्रस्तुत आत्म-वृतांत इसी पुस्तक का अंश है.
गवाह बनने की स्मृति
नारायण बाबू, तुम्ही सही-सही बताओ मुझे करना क्या चाहिए? स्थितियों के जाल से मैं जल्द बाहर निकलना चाहता हूँ.
भाई साहब, मैं भी इसी राय का हूँ कि आप उस शातिर बदमाश से दुश्मनी न मोल लें और वह भी दूसरे की खातिर. आप भी अदालत में शपथ-पत्र दीजिए कि मैंने घटना घटते नहीं देखी है.
यह तो सरासर झूठ बोलना होगा. मैं झूठ बोलने के लिए दंडित किया जाऊंगा. न्यायालय में आपके साथ मैंने भी लंबी नौकरी की है. झूठ बोलने के जुर्म के लिए अदालतें मुकदमा चलाती भी हैं और नहीं भी. बल्कि बहुत कम मामलों में चलाती हैं.
न भी चलाने पर मेरी बदनामी होगी. लोगों को पता लग ही जाएगा कि हृदयेश भी बदमाश से डर गए. एकदम पद्दा साबित हुए. आदमी की फजीहत, उसका थू-थू होना भी सजा है. मैं मृतक के भाई जैसा तो हो नहीं सकता. उसकी कोई सामाजिक छवि है नहीं. दो कौड़ी के आदमी के पास होने को कुछ होता नहीं है.
अपनी प्रतिष्ठा, अपनी छवि का अधिक ध्यान रखना भी सही नहीं होता है.
तुमने यह नहीं सोचा कि मैं लेखक भी हूँ, साहित्यकार. मैंने अपनी कहानियों, उपन्यासों में एक-से-एक जीवट पात्रों, पराजय न स्वीकार करने वाले चरित्रों को जन्म दिया है. मेरे पाठकों के साथ मेरे ये पात्र मेरी टूटन, मेरी विचलन के लिए मुझसे सवाल करेंगे.
भाई साहब, आपने स्वयं कई बार मुझसे कहा है कि साहित्य का संसार जीवन के संसार से भिन्न होता है. वह आदर्शों के हरे, लाल, ऊंदे चमकीले रंगों से रंगा होता है जबकि वास्तविक जीवन में काले, धूसर, मटमैले रंग ही अपने असली होने की प्रतीत कराते हैं.
नारायण बाबू, तुम भी मुझे संकट में फंसा देखकर मेरी घेराबंदी करने लगे हो. कृपया मत करो. मुझे सोचकर रास्ता बताओ कि भौतिक रुप से मुझे कोई बड़ी क्षति पहुँचे न और मेरी छवि भी बनी रहे.
नारायण बाबू, हर व्यक्ति के जीवन में कठिन परीक्षा का समय जरूर आता है, कभी न कभी. मुझे लगता है कि मेरी परीक्षा हो रही है. इस परीक्षा में मैं सफल होना चाहता हूँ.
भाई साहब, आपकी सफलता से इस बंदे को भी सुख मिलेगा.
तुमको भी अनुभव होगा कि जो आदमी डरता नहीं है उससे उसका शत्रु भी डरता है.
हाँ, इतनी आसानी से तो शत्रु टक्कर नहीं लेता है.
भय दरअसल आदमी के अपने अंदर होता है. वही उसे डराता है.
यह बात आपने अनेक बार अपनी रचनाओं में कही है.
लेकिन अंदर का भय आदमी को बाहरी भय से जोड़ देता है और यह जोड़ ही उसे बहुत परेशान करता है. मुझे स्वयं अपने को लेकर भय नहीं है. बच्चों को लेकर है.
मगर बच्चों को तो डर नहीं है.
मगर मुझे तो उनको लेकर है. मैं बाप हूँ, दादा हूँ.
हृदयेश में वैसी इच्छी जगी थी और नारायण बाबू प्रकट हो गए थे.
नारायण बाबू, तुमने आज का अख़बार पढ़ा होगा. न पढ़ा हो तो मेरा वाला पढ़ लो. पीलीभीत के न्यायालय परिसर में एक आदमी के गोली मार दी गई, वकील के बिस्तर पर. हाँ, जिसका बाप मारा गया था उसके बेटे ने बाप के हत्यारे को मार दिया. तुमको याद होगा, अपनी ही कचहरी में प्रथम अतिरिक्त सेशन जज सांवल सिंह साहब की अदालत में उनकी मौजूदगी में ही अदालत के अंदर बैठे व्यक्ति ने छिपाकर लाए तमंचे से फायर किया था.
हाँ, वह आदमी भी अभियुक्त था. मारने वाले की लड़की के साथ बलात्कार किया था.
लेकिन गवाह के भी तो गोली मारी जा सकती है, गवाही के वक्त.
मारने को तो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के भी गोली मार दी गई थी जिनकी सुरक्षा के चौकस घेरे में परिंदा भी पर मार नहीं सकता था.
हाँ, नारायण बाबू तुम ठीक कहते हो. कोई भी मारा जा सकता है. मौत का समय और कारण अटल है.
नारायण बाबू, मैं सुबह मुँह अंधेरे दूध लेने जाता था. अब जाना छोड़ दिया है. दूधवाला आकर दे जाता है.
भाभी जी शिकायत तो नहीं करतीं कि दूध पतला आता है.
नहीं, कह रही थीं दूध सही आ रहा है. उन्होंने ही लेने जाने से रोका है.
नारायण बाबू तुम आ गए. आ जाया करो. तबियत एकदम से उखड़ जाती है. इस समय साढ़े छह बज रहे हैं. देखो, अभी भी अंधेरा पूरा घिरा नहीं है. मैं डेढ़ घंटा पहले, बल्कि सवा चार बजे मंडी गया था. पत्नी की चप्पल में नयी बद्धी (स्ट्रिप्स) पड़नी थी. मेरी सेंडिल का सोल भी उखड़ गया था. तुम जानते हो मोची अब मंडी में ही बैठते हैं. मैं मरम्मत कराने के लिए एक जाने समझे हुए मोची के पास रुका ही था कि एक और जवान शख्स वहाँ अपने जूते में कील लगवाने आ गया. मैं मरम्मत कराकर तहसील के अंदर से गुजरने वाली गली से लौटने लगा. वह शख्स भी उसी गली में मेरे पीछे लग लिया. उसके चेहरे पर एक बड़ा सा जख्म का निशान था. मैं आधी गली से लौट आया. वह भी दो मिनट बाद यह कहता हुआ लौट आया कि आगे मरखन्ना साँड़ गली को छेंके खड़ा है. मैं बाजार में रुका रहा. सेल्स-टैक्स वाले वकील साहब दीख गए. उनके स्कूटर पर बैठकर कोतवाली वाली सीधी सड़क से आ गया. नारायण बाबू मुझे लगता है वह आदमी उस टाइगर बदमाश का ही भेजा हुआ था और गली में हमला कर मेरा सफाया कर देता.
हो सकता है यह आपका शक हो. गली में साँड़ अक्सर रहते हैं. साँड़ की वजह से वह लौट आया होगा.
नारायण बाबू, जब तक मैं मोची के पास रहा, वह आदमी बराबर मुझे घूरता रहा था. मेरे पैसे देने के बाद ही उसने पैसे दिए थे. फिर साथ लग लिया था.
हृदयेश हथठेले पर से सब्जी ले रहे थे. कई दिनों से वह इस प्रकार की खरीददारी से काम चला रहे थे. ओमप्रकाश यानी ओमी भैया की नज़र उनपर पड़ गई. कहा कि वह उनको याद कर रहे थे. याद किया जा रहा व्यक्ति यदि तुरंत दीख जाए तो लंबी उम्र उसकी होती है. इधर अपने व्यवसाय व कुछ अन्य कामों के सिलसिले में उनका बाहर रहना अधिक हुआ. इसलिए मिलना न हो सका. वह बड़ी आत्मीयता से उनको कोठी में ले गए. नौकर से उनकी सब्जी उनके यहाँ भिजवा दी. कॉफी बनवाई कि कॉफी पीने की उनकी भी इच्छा हो रही थी. फिर कुछ औपचारिक बातें कर कि इधर वह क्या लिख रहे हैं,‘सरिता’, ‘माया’, ‘इंडिया टुडे’ जैसी पापुलर मैगजीनों में बहुत दिनों से उनका कुछ देखा नहीं है. टीवी सीरियलों के लिए वह जरूर लिखा करें.
ओमप्रकाश हत्या वाले उस मामले पर आ गए. कहा कि जो मारा गया है वह खुराफाती आदमी था. कई जगह से अपनी अकड़-फूँ और क़ानूनबाजी के कारण नौकरी से निकाला गया था. नेतागीरी के नशे में कुछ ज़्यादा उछल-कूद करने लगा था, नाल ठुकवा लेने वाले मेढ़क की तरह. हृदयेश जी को मालूम नहीं होगा कि उसके बाप ने एक मेहतरानी को घर में डाल लिया था और वह उसी से पैदा था. बाप सालों तक अपनी भुर्जी बिरादरी से बाहर रहा. जब वह मेहतरानी मर गई तभी वह बिरादरी में वापस लिया गया, वह भी डाँट-जुर्माना भरकर.
नुत्फे का नुक्स सात पीढ़ियों तक रहता है और मृतक तो सीधा उस नुत्फे का नतीजा था. नगरपालिका के सभासदों वाले चुनाव में इसने मुसलमान उम्मीदवार की पैरवी की थी हालाँकि मुँह की खानी पड़ी थी. आँख के अस्पताल के पीछे की उस ज़मीन के टुकड़े को हरीशंकर बाजपेयी लेना चाहता था, अपने मकान के वास्ते. बयाना भी दे चुका था. मृतक ने अपने बेचने वाले संबंधी को उल्टा-सीधा समझाकर कि उसे बाद में पूरे पैसे भी नहीं मिलेंगे और पास में पड़ा दूसरा टुकड़ा भी छल-कपट से हथिया लिया जाएगा, संबंधी से बयाना वापस करा दिया कि उसे अभी ज़मीन बेचना नहीं है. फिर चाह माह बाद ही उसकी पक्की लिखा-पढ़ी एक दूसरे आदमी के नाम करा दी.
बाजपेयी उतना बुरा नहीं है जितना समझ लिया गया है. भगवान शिव का भक्त है. बगैर शिवजी पर जल चढ़ाए मुँह में पानी नहीं डालता है. सावन के महीने में गोला गोकरण नाथ नंगे पाँव काँवर लेकर जाता है. भले आदमियों के लिए बाजपेयी एकदम भला है. हाँ, दुष्टों के साथ कोई रियात नहीं. शक्करखोरा को शक्कर मूंजी को टक्कर. वह भी मानते है कि उसको अपने गुस्से को इस तरह अंजाम नहीं देना चाहिए था. हर आदमी की मौत के लिए कोई बहाना तय होता है और यह बहाना भी ऊपर वाला तय करता है.
उनको यह जानकर ताज्जुब हुआ कि हृदयेश जी जैसा सीधा-सादा लिखने-पढ़ने वाला आदमी कैसे इस लफड़े में फंस गया. हृदयेश ने जब घटना का प्रत्यक्षदर्शी होने के नाते क़ानून की सहायता करना एक जिम्मेदार नागरिक वाला कर्तव्य बताया और इस कर्तव्य के साथ अंतरात्मा की आवाज़ की बात भी जोड़ दी, तो ओम प्रकाश हंस दिए, इस अंतरात्मा की आवाज़ को नेताओं के लिए ही रहने दीजिए जिन्होंने गंदे से गंदा इस्तेमाल कर इसे घिनौना बना दिया है. फिर अपने अनुरोध पर बल देने के लिए कहा हरीशंकर बाजपेयी वसुंधरा ऑयल मिल वाले उनके ममेरे भाई का आदमी है. इस नाते उनका अपना भी आदमी हुआ.
ओम प्रकाश उनको बाहर तक छोड़ने आए थे. उनका उस कोठी से बाहर आना उधर से गुजर रहे पास के मोहल्ले में रहने वाले एक परिचित ने देख लिया था. बोला,‘‘आजकल ओमी भैया जनाब की बड़ी खातिर-तवाजो कर रहे हैं. मैं उड़ती चिड़िया को भाँप लेता हूँ. आपसे उस मुकदमे की बात की होगी जिसमें आप गवाह हैं.’’
उनके हाँ करने पर उसने ओमी भैया के उस संबंधी के लिए गाली बकी. कहा, उस बगुला भगत की ऑयल मिल ही नहीं है और भी धंधा है, सफेद की आड़ में काला, हिरोइन का. वह जिस अहिल्या देवी विद्यालय का मैनेजर है वहाँ की मीठी चटपटी मास्टरनियों का स्वाद अफसरों को कराता रहता है. वह बाजपेयी गुंडा इन कामों के लिए ही वहाँ है. और उनको पता नहीं, यह ओमी भैया भी धूर्तराज है. काली भाई यानी अफीम का यह भी धंधा करता है. चोर-चोर मौसेरे भाई. फिर उसने बताया कि उसका सगा बहनोई इन्हीं ऑयल मिल वालों से एक फर्जी भुगतान को लेकर मुकदमा छाती ठोककर लड़ रहा है.
नारायण बाबू, लोगों के मना करने पर मुझमें बात सच-सच कहने की जिद तेज होती जा रही है.
भाई साहब, जिद शक्ति होती है. पक्ष सही होने पर वह अपने आप आकर साथ खड़ी हो जाती है.
हृदयेश के मस्तिष्क में गवाह बनने की वह स्मृति, जो इस दौरान कई बार आ चुकी थी, फिर उपस्थित हो गई थी. वर्तमान में घटी कोई घटना उसी प्रकृति की अतीत में घटी घटना को खोज-तलाश कर सामने ले ही आती है भले ही वह घर अतीत में क्यों न हो. किसी निष्कर्ष पर न पहुँचने पर वह बारबार ऐसा करती है. उस पुरानी घटना की स्मृति से वह जैसे आघात दिलवाती है कि परे हटो या आगे बढ़ो.
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