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शनिवार, 30 सितंबर, 2006 को 20:57 GMT तक के समाचार

दुर्गेश उपाध्याय
मुंबई

'समलैंगिगता तो समाज में पहले से है'

अभिनेता से फ़िल्म निर्माता बने अमोल पालेकर का कहना है कि समलैंगिगकता तो भारतीय समाज में पहले से ही रही है, फ़िल्मों का विषय अब जाकर बन रही हैं.

अपनी नई फ़िल्म ‘क्वेस्ट’ के रिलीज़ की तैयारी में लगे अमोल पालेकर मानते हैं कि वे सार्थक विषयों वाली फ़िल्मों में काम करके संतुष्ट होते हैं.

अमोल पालेकर सत्तर के दशक के बेहद सफ़ल कलाकार अब फ़िल्म निर्माण में सक्रियता से लगे हुए हैं.

अमोल फ़िल्म ‘क्वेस्ट’ के बारे में बताते हैं,‘‘ क्वेस्ट फ़िल्म पति-पत्नी संबंधों पर आधारित है, जिसमें एक हिस्सा समलैंगिगकता भी है.’’

वे साफतौर पर कहते हैं कि केवल समलैंगिगकता यानी होमोसेक्सुअल्टी ही उनकी फ़िल्म का आधार नहीं है.

वे मानते हैं कि कहानी में ये एक मज़बूत पक्ष ज़रूर है.

ये पूछे जाने पर कि उनके जैसे निर्देशक के लिए ऐसे गंभीर विषय पर फ़िल्म बनाना कितना कठिन था वे कहते हैं,‘‘हाँ, थोड़ी सी दिक्कत तो थी लेकिन फ़िल्म की कहानी इतनी अच्छी थी कि बाद में सारी मुश्किलें दूर हो गईं.’’

फ़िल्म में समलैंगिगकता के विषय में अमोल साफतौर पर कहते हैं,‘‘ये सारी बातें कहीं न कहीं हमारी संस्कृति और हमारे साहित्य में देखी जाती रही हैं, लिखी जाती रही हैं. हाँ इतना ज़रूर है कि फ़िल्मों में ये अब उभरकर लोगों के सामने आ रही है.’’

अमोल पालेकर कहते हैं, ‘‘मैं हमेशा ऐसी फ़िल्में बनाना चाहता हूँ जो लीक से हटकर हो.’’

इससे पहले भी उन्होंने ऐसी कई फ़िल्मों का निर्माण किया जो अलग-अलग सामाजिक मुद्दों पर आधारित रही हैं.

इससे पहले उनकी फ़िल्म ‘पहेली’ भारत की ओर से ऑस्कर के लिए भेजी गई थी. कला फ़िल्मों से भी सक्रिए रूप से जुड़े अमोल एक ऐसे निर्देशक हैं जो जीवन के बेहद करीब से जुड़े विषयों पर फ़िल्म बनाने में दिलचस्पी रखते हैं.

यह पूछे जाने पर कि कला और व्यावसायिक या मुख्यधारा के सिनेमा में वे अपने आपको कहाँ ज़्यादा सुविधाजनक स्थिति में महसूस करते हैं वे कहते हैं,‘‘कला फ़िल्में ज़िंदगी के क़रीब होती हैं, जबकि व्यावसायिक सिनेमा में कल्पना ज़्यादा होता है. मैं हमेशा से ऐसी फ़िल्में या ऐसा काम पसंद करता हूँ जो सार्थक हो.’’

ये पूछे जाने पर कि क्या वे मानते हैं कि सार्थक फिल्मों में कमी आई है, अमोल पालेकर कहते है कि ऐसा नहीं है कि आजकल अच्छी फ़िल्में नहीं बनतीं लेकिन इतना ज़रूर है कि इनमें थोड़ी कमी आई है.

पालेकर कहते हैं कि भारतीय सिनेमा काफ़ी नाजुक मोड़ पर है जहाँ एक तरफ. तो मसाला फ़िल्मों का ज़ोर है जबकि दूसरी तरफ़ ऐसी फ़िल्में हैं जो ज़िंदगी की कड़वी सच्चाइयों को दर्शकों के सामने लाती हैं.