गुरुवार, 28 सितंबर, 2006 को 23:28 GMT तक के समाचार
जया जादवानी
कविताएँ
जब प्रेम नहीं होगा
यातना नहीं होगी, न दुख
पीड़ा भरी उत्सुकता नहीं होगी
लहरे दुनियावी पटक-पटक कर धोंएंगी देह
उछाल देगीं किनारे पर
न चाह होगी उठकर खड़े होने की
न सुखाने की धूप में खुद को
न स्वप्न बिन बुलाया
न चाँदनी रात होगी घायल
एकांत की खौफनाक नंगी चोटी पर
जमकर बर्फ हो जाने का भय नहीं होगा
न रूदन होगा किसी सुराख से निकलता
न हँसी होगी झमाझम बरसती
नींद पड़ी होगी बिल्ली के बच्चे सी भीतर
ठंडी रातों में अलसाई
बिछौना सर्द होने का भय नहीं होगा आँखों को
बंद रहेंगे किवाड़ पलकों के हर वक़्त
प्रतीक्षा नहीं होगी, उम्मीद भी नहीं
सुबह नहीं होगी, शाम भी नहीं
आ खड़ी होगी मृत्यु इक दिन चुपचाप सिरहाने
आँख मूंद उसे अदिखा करने का नाटक नहीं होगा
न होगी जीने की हसरत, न पुकार
‘रूके रहना, फिर आएंगे, फिर-फिर आएगें’
नहीं कहेंगे किसी को
बिना शोर मचाए चले जाएगें चुपचाप
जब प्रेम नहीं होगा, कुछ भी नहीं होगा.
कोई नहीं सुनता
कोई नहीं सुनता
देवताओं को तो अप्सराओं का
नाच देखने से फुरसत नहीं
वृक्ष से कहो तो वह बस अपनी
शाख पर लदे फूलों को सुनना चाहता है
जड़ें जाने क्या खोज रहीं
अंधेरी तटों के संसार में
जल को तो बताना ही बेकार है
इतने ही वेग से भागता है नदी की ओर
कि हैरान रह जाता है आसमां भी
बादलों को तो अपनी चादर पर
नक्काशी बनाने से अवकाश नहीं
बड़ी देर से कूकती एक कोयल
उड़ गई शाख से बिना कुछ सुने
कहूं तो कहूं किससे
दुनिया भागी जा रही पता नहीं किस ओर
घुमती हूं अपने पिंजर में
बिना खटखटाए दरवाजा
उगती हूँ अपनी आँखों में
आप ही चुपचाप
कहती हूँ आप-आप से
रब्बा! मैंने देखी है उसकी
आँखों में अपने लिए नमी.
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