शुक्रवार, 22 सितंबर, 2006 को 09:20 GMT तक के समाचार
देवानंद
अतिथि संपादक, बीबीसी पत्रिका
रोमाँस चिरकालिक होता है. चलता रहता है.
रोमाँस हमेशा बताता रहता है कि प्यार में अभी कुछ होना बचा हुआ है.
सेक्स तो अंतिम है. वह हो गया तो लगता है कि सब कुछ तो हो गया. हालांकि वह भी कोई बुरी चीज़ नहीं है. वह भी ईश्वर प्रदत्त है. इससे कोई बच भी नहीं सकता.
पुरुष को स्त्री अच्छी लगती है और स्त्री को पुरुष अच्छा लगता है.
जहाँ तक ख़ूबसूरती की बात है तो यह एक मनोवृत्ति की बात है.
मैं किसी सूरत को देखता हूँ तो नशा-सा छा जाता है.
मैं मानता हूँ कि नग्नता में कोई ख़ूबसूरती नहीं है. अगर आँखों में शर्म रहे तो ख़ूबसूरती ज़्यादा बढ़ जाती है.
कुछ लोगों को लगता है कि नग्नता दर्शकों को आकर्षित करने का एक आसान तरीक़ा है. लेकिन यह एकमात्र तरीक़ा नहीं है.
यदि आप इसके बिना दर्शकों को जीत सकते हैं तो आप बड़े फ़िल्मकार हैं और आप एक बड़ी चुनौती स्वीकार करते हैं.
यदि फ़िल्म में अंतरंग दृश्य दिख़ाना ज़रुरी है तो दिखाया जाना चाहिए. इसे रोकने का सवाल ही नहीं. लेकिन ऐसा हमेशा नहीं दिखाया जा सकता.
इसे टाला भी नहीं जा सकता. आख़िरकार हर कोई सेक्स के साथ जीता है, उसके बारे में सोचता है और स्वप्न भी देखता है.
लेकिन एक रेखा तो खींचनी होगी.
आप यथार्थ दिखाना चाहते हैं यह ठीक है लेकिन इसकी भी हदें तो तय करनी होंगी. नग्नता को लेकर भी और दूसरी चीज़ों के लिए भी.
मैं किसी का नाम नहीं ले रहा लेकिन क्या यह ठीक है कि यथार्थ के नाम पर फ़िल्मों के पात्र गालियाँ देते रहें.
ठीक है कि इंसान गाली बकता है लेकिन वह हर वक़्त को गालियाँ नहीं बकता रहता. इसलिए इसे पर्दे पर दिखाया जाना भी ज़रुरी नहीं.
आप जो कहना चाहते हैं उसे कहने के कई विकल्प मौजूद हैं.
आपको कल्पनाशील होकर विकल्प तलाश करने होंगे. और विकल्प की कभी कमी नहीं होती.