गुरुवार, 14 सितंबर, 2006 को 21:02 GMT तक के समाचार
सलमा ज़ैदी
संपादक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम
वह उम्र जब अक्षर पहचानने की समझ आती है, लगभग उसी दौरान मेरी पहचान हुई बाल पत्रिकाओं से.
पहले तस्वीरें देखने के लिए और फिर धीरे-धीरे उन्हें पूरी तरह खंगालने के लिए इन पत्रिकाओं ने मुझे पूरी तरह मोह लिया.
चंदामामा, पराग, बाल भारती, राजा भैया, बालक मुझे गुड्डे-गुड़ियों से भी ज़्यादा प्रिय थे.
घर में उर्दूभाषी माता-पिता और अन्य रिश्तेदारों के होते हुए इन हिंदी पत्रिकाओं ने कैसे मुझे वशीभूत कर लिया, आज तक नहीं समझ पाई हूँ.
जिस दिन अख़बार वाला इनमें से कोई पत्रिका लाता था उस दिन मेरी आँख तड़के ही खुल जाती थी. नए, ताज़ा छपे काग़ज़ों की वह महक भला किसी सेंट में कहाँ.
घर में कबाड़ी आता तो मैं पत्रिकाएँ छुपाती पकड़ी जाती और डाँट खाती.
बाद में जब लिखना शुरू किया और पराग में पहली कहानी छपी तो जो ख़ुशी हुई थी वह बड़े से बड़ा चेक मिलने पर नहीं हुई.
जिस पत्रिका से पाठिका के तौर पर जुड़ी थी उसकी लेखिका बनना ज़ाहिर है एक बहुत ही सुखद एहसास था.
बाद के दौर में धर्मयुग, सारिका, कादंबिनी, साप्ताहिक हिंदुस्तान और मनोरमा मेरी दिन रात की साथी बन गईं.
और फिर जब एक-एक करके इन पत्रिकाओं के बंद होने का सिलसिला शुरू हुआ तो ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरा कोई प्रियजन बिछुड गया हो.
हिंदी में किसी अच्छी साहित्यिक पत्रिका की कमी बहुत खलने लगी.
जब बीबीसी की इस वेबसाइट से जुड़ी तो कहीं न कहीं अपने जैसे उन पाठकों की पीड़ा का एहसास भी साथ आया.
अब बीबीसी पत्रिका के माध्यम से एक छोटा सा प्रयास किया है कुछ स्तरीय रचनाओं को अपने पाठकों तक पहुँचाने का.
उतने बड़े पैमाने पर कुछ कर दिखाने का दावा अभी तो नहीं किया जा सकता लेकिन हाँ, अगर आपका साथ रहा और आपने उत्साह बढ़ाया तो क्यों नहीं.
यह पत्रिका हमारी भी है और आपकी भी. इसे एक उत्कृष्ट पत्रिका बनाने का दारोमदार भी हम दोनों का ही है.
तो बताइए, और क्या किया जाए?