शुक्रवार, 08 सितंबर, 2006 को 06:20 GMT तक के समाचार
रत्ना कौशिक
‘‘जिस देश के पास हिंदी जैसी मधुर भाषा है वह देश अंग्रेज़ी के पीछे दीवाना क्यों है? स्वतंत्र देश के नागरिकों को अपनी भाषा पर गर्व करना चाहिए. हमारी भावभूमि भारतीय होनी चाहिए. हमें जूठन की ओर नहीं ताकना चाहिए.’’
हिंदी को लेकर यह पीड़ा अपनी भाषा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और आस्था रखने वाले डॉ रामकुमार वर्मा की है.
हिंदी साहित्य के निर्माताओं में से एक डॉ रामकुमार वर्मा का इस साल जन्म शताब्दी वर्ष है. उनका सारा जीवन हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य की सेवा में समर्पित रहा.
डॉ रामकुमार वर्मा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. लेखन की ऐसी कोई विधा नहीं जो उनकी कलम से अछूती रह गई हो.
कभी कवि तो कभी एकांकीकार, कभी नाटककार तो कभी संपादक, कभी शोधकर्ता तो कभी साहित्य के इतिहास लेखक.
न जाने कितने-कितने रूपों में इस कृतिकार ने हिंदी के साहित्य आकाश को अपनी आभा से चमत्कृत किया. 101 से अधिक कृतियाँ उनकी सृजनशीलता का दस्तावेज़ हैं.
कोई उन्हें नाटक सम्राट मानता है तो कोई हिंदी एकांकी का जनक. कोई कहता है आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद अगर किसी ने प्रमाणिक हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा है तो वे डॉ रामकुमार वर्मा ही है.
आलोचकों के लिए हैरत
सच तो यह है कि किसी एक व्यक्ति का साहित्य की इतनी विधाओं पर ऐसा अधिकार होना आलोचकों के लिए हैरत का प्रश्न है.
महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर, अशोक, समुद्र गुप्त, चंद्रगुप्त और शिवाजी से लेकर 1857 के प्रथम स्वातंन्ञ्य संग्राम के महानायकों तक सभी उनके नाटकों के पात्र रहे हैं.
अपने 26 से अधिक नाटकों के माध्यम से वे देशवासियों में भारतीयता, देश प्रेम और इतिहास से प्रेरणा लेने की चेतना भरते रहे हैं.
साहित्यकार कमलेश्वर कहते हैं,'' डॉ वर्मा ने एकांकी विधा का सृजन करके साहित्य में प्रयोगवाद को बढ़ावा दिया. डॉ धर्मवीर भारती, अजित कुमार, जगदीश गुप्त, मार्कण्डेय, दुष्यंत, राजनारायण, कन्हैयालाल नंदन, रमानाथ अवस्थी, ओंकारनाथ श्रीवास्तव, उमाकांत मालवीय और स्वयं मैं उनका छात्र रहा हूं.''
ऐतिहासिक नाटकों का यही सृष्टा जब भावुक हो उठा तो उसके कवि मन से ‘एकलव्य’, ‘उत्तरायण’, एवं ‘ओ अहल्या’ जैसे कालजई सांस्कृतिक महाकाव्य लिख डाले.
हिंदी एकांकी के इस जनक ने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और साहित्यिक विषयों पर रंगमंच पर खेले जा सकने वाले 150 से अधिक एकांकी लिख सबको हतप्रभ कर दिया.
यही वजह थी कि भगवती चरण वर्मा ने कहा था, ‘‘ डॉ रामकुमार वर्मा रहस्यवाद के पंडित हैं. उन्होंने रहस्यवाद के हर पहलू का अध्ययन किया है. उस पर मनन किया है. उसको समझना हो और उसका वास्तविक और वैज्ञानिक रूप देखना हो तो उसके लिए श्री वर्मा की ‘चित्ररेखा’ सर्वश्रेष्ठ काव्य ग्रंथ होगा.’’
रुचि
15 सितंबर, 1905 को जन्मे डॉ रामकुमार वर्मा की कविता, संगीत और कलाओं में गहरी रुचि थी.
1921 तक आते-आते युवक रामकुमार गाँधी जी के उनके असहयोग आंदोलन में सम्मिलित हो गए.
उन्होंने 17 वर्ष की आयु में एक कविता प्रतियोगिता में 51 रुपए का पुरस्कार जीता था. यही से उनकी साहित्यिक यात्रा आरंभ हुई थी.
डॉ रामकुमार वर्मा ने देश ही नहीं विदेशों में भी हिंदी का परचम लहराया. 1957 में वे मास्को विश्वविद्यालय के अध्यक्ष के रूप में सोवियत संघ की यात्रा पर गए.
1963 में उन्हें नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय ने शिक्षा सहायक के रूप में आमंत्रित किया. 1967 में वे श्रीलंका में भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष के रूप में भेजे गए.
उनके कृतित्व से प्रभावित होकर स्विट्जरलैंड के मूर विश्वविद्यालय ने उन्हें डीलिट की उपाधि से सम्मानित किया.
भारत सरकार ने उन्हें 1965 में पद्मभूषण के राष्ट्रीय अलंकरण से विभूषित किया.
उनकी जन्मशती साहित्य जगत के लिए सृजन का एक पर्व है. इसीलिए पूरे वर्ष भर देश में जगह-जगह उनकी याद और सम्मान में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं.