शुक्रवार, 25 अगस्त, 2006 को 13:59 GMT तक के समाचार
रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी उत्तर प्रदेश संवाददाता
शहनाई को नई पहचान देने वाले भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान के निधन के बाद उनके छोटे बेटे नैयर हुसैन को इस परंपरा का वारिस घोषित किया गया है.
उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान के निधन के बाद संगीत की दुनिया में यह एक बड़ा सवाल था.
वजह है भारतीय शास्त्रीय संगीत और शहनाई को बिस्मिल्ला ख़ान का योगदान. उनके पीछे इस परंपरा को आगे ले जाना और शहनाई को उसके स्थान पर बनाए रखना एक नई चुनौती जैसा है.
बनारस के बेतिया बाग मैदान से जब उनकी अंतिम यात्रा निकलने वाली थी, बार-बार मेरे मन में यह सवाल उठ रहा था कि बिस्मिल्ला ख़ान की इस परंपरा को कौन आगे बढ़ाएगा?
उस्ताद के शव के सिरहाने बैठे बड़े बेटे महताब हुसैन ने मेरा प्रश्न सुना तो बड़े सहज भाव से बोले, "हमारे छोटे भाई नैयर हुसैन हैं, वही सँभालेंगे यह परंपरा."
एक पत्रकार का दायित्व इस मामले में कई बार कठिन हो जाता है कि एक शोकग्रस्त परिवार से टेपरिकार्डर और माइक लेकर सवाल-जवाब करें. बहरहाल, लोगों की मदद से मैंने पार्क के एक हिस्से में बैठे नैयर हुसैन ख़ान को ढूँढ़ लिया.
बड़ी ज़िम्मेदारी
68 वर्ष के नैयर हुसैन खु़द भी बूढ़े हो चले हैं. आगे के दो दाँत गायब हैं.
बड़े सहज भाव से उन्होंने जवाब दिया, "उन्होंने मरने से पहले मुझे दिल से दुआ दी और कहा कि जो इल्म तुमको दिया, वह किसी को नहीं दिया. इसको मरने मत देना. जैसे हमने शहनाई को उठाकर आसमान में रख दिया, वह फ़र्ज अब तुमको निभाना है."
पिता की विरासत को आगे बढ़ाने को लेकर नैयर हुसैन की कुछ चिंताएँ भी हैं. वे कहते हैं कि इस काम को वो तभी कर पाएँगे जब पूरा ख़ानदान उनका साथ देगा.
बिस्मिल्ला ख़ान अपने पीछे पाँच बेटे और तीन बेटियों समेत 60-70 लोगों का परिवार छोड़ गए हैं.
पूरे परिवार ने सर्वसम्मति से यह फैसला लिया है कि नैयर हुसैन शहनाई का काम आगे बढ़ाएँगे. उनके अलावा जामिन हुसैन भी शहनाई बजाते हैं और नाज़िम हुसैन तबले के उस्ताद हैं. ये सभी लोग बिस्मिल्ला ख़ान के साथ ही महफ़िलों में साज बजाते थे.