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सोमवार, 21 अगस्त, 2006 को 03:16 GMT तक के समाचार

शहनाई के बेताज बादशाह

भारत के मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान के वाराणसी में देहांत के बाद उन्हें राजकीय सम्मान के साथ सोमवार को दफ़ना दिया गया. वे 91 वर्ष के थे.

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान शहनाई के बेताज बादशाह माने जाते थे. बिस्मिल्ला ख़ान ने अपनी शहनाई की धुनों से पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया था.

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान को दफ़नाया गया

उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया था.

उस्ताद की ख़ास बात केवल शहनाई पर उनका एकाधिकार ही नहीं बल्कि उनका सादा रहन-सहन और मृदुल व्यवहार था.

उनके पूर्वज राजा महाराजाओं के दरबार में संगीतकार थे. ख़ुद उस्ताद ने शहनाई के गुर अपने मामा अली बख़्श से सीखे थे.

संत संगीतकार थे बिस्मिल्ला ख़ान

उस्ताद ख़ुद को शिया मुसलमान बताते थे जबकि उनके धर्म में गाने-बजाने पर पाबंदी है.

संगीत को ही अपना मज़हब माननेवाले उस्ताद संगीत और विद्या की देवी सरस्वती की भी उपासना करते थे.

बनारस में गंगा किनारे घंटों रियाज़ करनेवाले उस्ताद हर साल मुहर्रम के आठवें रोज़ शहनाई बजाते थे जिसको हिंदू-मुसलमान सभी समानभाव से सुनने आते थे.

मिसाल

बिस्मिल्ला ख़ान को भारत में हिंदू-मुसलमान सौहार्द की एक जीती-जागती मिसाल माना जाता है.

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान ने 15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि में लालक़िले की प्राचीर पर शहनाई बजा कर भारत की आज़ादी का स्वागत किया था.

ख़ान साहब का जन्म 21 मार्च, 1916 को बिहार के डुमराँव ज़िले में हुआ था.

उन्होंने अपने मामा से शहनाई की तालीम हासिल की और फिर उन्हीं के साथ काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाने लगे.

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने राजाओं और ज़मींदारों की महफ़िलों में बजाए जाने वाले इस साज़ को जन-जन तक पहुँचाया.

यह उन्हीं की बदौलत है कि शहनाई की शुमार भी सितार, सरोद और तबले जैसे वाद्यों के साथ होने लगी.

यह साज़ जो केवल शादी-ब्याह या फिर मंदिरों मे बजाया जाता था, अब संगीत सम्मेलनों में बजाया जाने लगा है.

बिस्मिल्ला ख़ान ने एक संगीतज्ञ के रूप में जो कुछ कमाया था वो या तो लोगों की मदद में ख़र्च हो गया या अपने बड़े परिवार के भरण-पोषण में.

एक समय ऐसा आया जब वो आर्थिक रूप से मुश्किल में आ गए थे, तब सरकार को उनकी मदद के लिए आगे आना पड़ा था.

उन्होंने अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा व्यक्त की थी लेकिन उस्ताद की यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई.