रविवार, 06 अगस्त, 2006 को 08:40 GMT तक के समाचार
साइजी माकिनो 36 वर्ष की उम्र में एक बार भारत आए तो फिर यहीं के होकर रह गए.
आए तो थे गांधी जी के सेवाग्राम में स्थित हिंदुस्तानी तालीमी संघ में पशु चिकित्सक के रूप में पर हिंदुस्तान का ऐसा रंग चढ़ा कि फिर जापान लौटने का मन ही नहीं किया.
खादी के कपड़े, सीधा-सरल व्यक्तित्व, व्यवहार में गज़ब की सादगी और आंखों में झाँकती ईमानदारी. एक ऐसा व्यक्ति जिसे देखकर ही उसकी निश्छलता, मेहनत, निष्ठा और समर्पण का अंदाजा लगाया जा सकता है.
82 वर्ष की उम्र में भी कुछ और करने, कुछ और लिखने की इच्छा. कंधे भले ही कुछ झुक गए हो पर इरादे अब भी बुलंद हैं. महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर और बिनोबा भावे के भक्त और हिंदी सेवी साइजी माकिनो को दिल्ली स्थित हिंदी भवन ने ‘हिंदी रत्न’ से सम्मानित किया है.
पेश है इस अवसर पर रत्ना कौशिक की माकिनो से हुई बातचीत के अंश
भारत में पहली बार कब आना हुआ?
1958 की बात है. मुझे फुजेई गुरुजी का हिंदुस्तान से बुलावा आया. वे 1931 से गांधी के सहयोगी थे और वर्धा स्थित सेवाग्राम में रहते थे. सेवाग्राम में एक पशु चिकित्सक की ज़रूरत थी. मेरा भी उन दिनों जापान में मन नहीं लग रहा था. इसलिए चला आया. आज 45 वर्ष होने को आए हैं. अब तो भारत ही मेरा घर है.
वर्धा से आप शांतिनिकेतन कैसे पहुंच गए?
फुजेई गुरुजी ने मुझे रवींद्रनाथ टैगोर के पास शांतिनिकेतन भेजा. शांतिनिकेतन में गुरुदेव के साथ रहकर जीवन का अर्थ और चितंन की धारा ही बदल गई.
गुरुदेव का साथ और शांतिनिकेतन का वातावरण एक जापानी व्यक्ति को कैसा लगा?
गुरुदेव के व्यक्तित्व और शांति निकेतन के शांत परिसर के प्राकृतिक सौंदर्य ने मुझे इतना आकर्षित किया कि मेरा कहीं जाने का मन नहीं करता था. मैने भी इस पवित्र भूमि को अपनी जीवन साधना का आधार बना लिया. समझ नहीं आता कि गुरुदेव के व्यक्तित्व ने वातावरण को इतना सुंदर बना दिया या इतने शांत वातावरण ने ही गुरुदेव जैसे महापुरुष की रचना की है.
हिंदी सीखने का सिलसिला कब शुरु हुआ?
बिनोबा भावे जी के साथ 1959 में पैदल यात्रा करने के दौरान उन्होंने मुझे हिंदी सीखने का सुझाव दिया. सेवाग्राम में मेरे लिए आगरा के एक अच्छे हिंदी शिक्षक का इंतज़ाम किया गया. शुरू-शुरू में शिक्षक महोदय से मुझे ख़राब उच्चारण के लिए बहुत डाँट पड़ती थी पर धीरे-धीरे मैंने हिंदी बोलना सीख ही लिया.
साइजी यह बताइए कि हिंदी में काम करने की यह यात्रा कहां से आरंभ हुई?
सच तो यह है कि हिंदी की कृपा से मेरा जीवन चल पड़ा. वरना रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी कर पाना मुश्किल हो जाता. उन दिनों ग्वालियर की बिड़ला फैक्ट्री में जापानी तकनीक से काम शुरू किया गया. जापानी इंजीनियरों को हिंदी नहीं आती थी और फैक्ट्री में काम करने वाले भारतीयों को जापानी. मुझे बुलाया गया और एक दुभाषिए के रूप में मैने 400 रुपए महीने पर काम शुरु कर दिया. यहाँ मैंने चार साल काम किया और हिंदी में कई लेख लिखे जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए.
क्या जापानी और हिंदी साहित्य में कोई समानता है?
दोनों का लोक साहित्य लगभग समान है. मणिपुर और राजस्थान की लोक कथाएँ जापान की लोककथाओं जैसी ही हैं. इसका कारण है कि जापान की संस्कृति चीन और भारत की मिश्रित संस्कृति है. मैं भारत को दादा और चीन को पिता मानता हूं. हिंदी विश्व शांति की भाषा बने और मैं जीवन पर्यंत इससे जुड़ा रहूँ यह मेरी कामना है.
आपने हिंदी में कुछ पुस्तकें भी लिखी हैं?
हाँ थोड़ा बहुत लिखता हूं. कुछ किताबें लिखी हैं. ‘टैगोर और गांधीः एक तुलनात्मक अध्ययन’, जापानी आत्मा की खोज, जापानी कहानियाँ, मणिपुर की लोक कथाएं, भारत में चालीस सालः पुर्नविचार और सिंहावलोकन. आजकल अपनी आत्मकथा लिख रहा हूं. ‘भारतवर्ष में 45 सालः मेरी हिंदी यात्रा.’
सुना है आपने हिंदी से जापानी में अनुवाद भी किया है?
मुझे भगवती चरण वर्मा का उपन्यास ‘चित्रलेखा’ बहुत पसंद आया इसलिए मैंने उसका जापानी भाषा में अनुवाद किया है.
आप हिंदी फ़िल्में देखना पसंद करते हैं?
आज की फ़िल्मों में बहुत शोर-शराबा है. मुझे मीना कुमारी, नरगिस, अशोक कुमार और सुनील दत्त की फ़िल्में बहुत पसंद हैं.
कभी जापान की याद आती है?
जापान में मुझे अपना जापान नहीं मिलता. सब कुछ बदल चुका है. मुझे मेरा जापान मणिपुर में जाकर मिलता है. यहाँ का खाना-पीना, रहन-सहन, रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार सब कुछ जापान से मिलता जुलता है.
अंत में कोई ऐसी बात जो आप हिंदी पाठकों से कहना चाहें?
जिस देश के पास गांधी, टैगोर और माँ आनंदमयी का मार्गदर्शन हो उस देश को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. मुझे हमेशा इस बात का खेद रहता है कि जितना भारत माता का नमक खाया उतनी उसकी सेवा नहीं की. भारत बहुत बड़ा देश है. उसका दिल भी उतना ही बड़ा है. दुनिया का दूसरा कोई देश उसका मुक़ाबला नहीं कर सकता.