शनिवार, 29 जुलाई, 2006 को 16:50 GMT तक के समाचार
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह इस वर्ष 75 बरस के हो गए हैं. पिछले कुछ वर्षों से स्वास्थ्य के साथ उनका संघर्ष चल रहा है.
स्वास्थ्य की वजह से सप्ताह के तीन दिन अस्पताल में बिताने वाले वीपी सिंह बाक़ी के चार दिन सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक कामों के लिए समय निकालते हैं.
इसी दौरान पिछले कुछ महीनों में उनके जीवन की कई भूमिकाओं पर वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने उनसे कई सवाल पूछे. सिलसिला ख़त्म हुआ तो इकट्ठा हुई सामग्री को एक पुस्तक का रूप दे दिया गया और नाम रखा - 'मंज़िल से ज़्यादा सफ़र.'
इस पुस्तक में वीपी सिंह ने कई बातों का रहस्योद्घाटन किया है. कई मुद्दों पर अपना पक्ष रखा है और अतीत की घटनाओं को बताया है.
पूरी किताब सवाल-जवाब के रूप में लिखी गई है. राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित यह पुस्तक काफ़ी रोचक जानकारियों को भी सामने लाती है.
पढ़िए, 'मंज़िल से ज़्यादा सफ़र' के अंश-
सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री पद
सवाल-सोनिया गांधी प्रधानमंत्री पद लेने से पीछे क्यों हटीं?
जवाब- मेरे पास माखनलाल फोतेदार आए. उन्होंने कहा कि सभी वरिष्ठ नेताओं को यह जानकारी रहनी चाहिए कि सोनिया गांधी के जीवन पर बड़ा ख़तरा है, अगर वो प्रधानमंत्री पद स्वीकार करती हैं. उन्होंने जानकारी दी कि इस तरह की खुफ़िया रिपोर्ट है. इसलिए यह ज़रूरी हो गया है कि इसकी जानकारी सभी वरिष्ठ नेताओं को रहे. मैंने उनसे कहा कि कांग्रेस को यह पूरा अधिकार है कि वह किसको अपना नेता चुनती है. मैंने कहा कि अगर सोनिया गांधी के जीवन को ख़तरा है तो इस हकीक़त को स्वीकार करना चाहिए और उसके हिसाब से फ़ैसला करना चाहिए, क्योंकि हमने देखा कि राजीव गांधी का क्या हुआ, जब वे चुनाव जीतने जा रहे थे, उनकी हत्या हो गई. मेरा ख़्याल है कि माखनलाल फोतेदार ने यह बात अनेक वरिष्ठ नेताओं को बताई.
उसके बाद मैं 10, जनपथ गया. सोनिया गांधी से मुलाकात की. जब मैं वहाँ जा रहा था तो देखा कि गंगाचरण राजपूत अपनी कनपटी पर पिस्तौल लगाए हुए अपनी भावना जता रहे थे. लोग बाहर विरोध कर रहे थे. मकसद यह था कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री पद स्वीकार करें.
बहरहाल, मैं गया. वहाँ बच्चों से मिला. मेरे दिल में उनके लिए एक जगह बन गई है. उस दिन की बातचीत से ऐसा हुआ है. मैंने महसूस किया कि उनकी चिंता वास्तविक है. सोनिया गांधी ने मुझसे कहा कि "अगर मैं प्रधानमंत्री पद स्वीकार करती हूँ तो उससे दो बातें हो सकती हैं. एक, कि भारतीय जनता पार्टी और उनकी तरह के लोगों को एक मुद्दा मिल जाएगा. दूसरा, उस स्थिति में लंबे समय तक देश में ऐसा तीख़ा विवाद छिड़ा रहेगा जो तनाव का कारण बनेगा और वह देशहित में नहीं होगा."
सोनिया गांधी को इस मायने में मैंने संवेदनशील पाया. उनकी राजनीतिक समझ साफ़ थी. इसे मैं काफी महत्व देता हूँ. जहाँ तक उनके परिवार का सवाल है बच्चों की अपनी माँ के प्रति चिंता समझ में आती है क्योंकि वे अपने पिता को खो चुके हैं. मुझे उसमें किसी तरह का बनावटीपन का भान नहीं हुआ. मैं समझता हूँ कि उनका फ़ैसला इसी सोच में वास्तविक कारणों से हुआ.
इस बारे में सोनिया गांधी और उनके परिवार ने मुझ पर भरोसा किया. तभी यह बात मैं जान सका. इसका मेरे मानस पर असर बना हुआ है.
सवाल-आपने क्या सलाह दी?
जवाब-जब उन्होंने ये बातें मेरे सामने रखीं तो मैंने उनसे सहमति जताई. यह कहा कि आपका फैसला ठीक है. उन्होंने मुझसे दिल खोलकर बात की. कोई पर्दा नहीं था.
सवाल-सोनिया गांधी के जीवन पर ख़तरा हो सकता है अगर वे प्रधानमंत्री पद मंजूर कर लें इस सूचना का आधार क्या था?
जवाब-यह खुफ़िया रिपोर्ट थी. एक बार मेरे मन में आया कि कहीं यह राजग सरकार के निष्ठावान खुफ़िया अफ़सरों के दिमाग की उपज तो नहीं है. इस पर मुझे ऐसा मन में लगा कि इस सूचना के पीछे कहीं ऐसे ही अफ़सर तो नहीं हैं जो पिछली सरकार के इशारे पर रिपोर्ट दे रहे हों. मुझे शंका हुई कि सोनिया गांधी का रास्ता रोकने के लिए कहीं ऐसा तो नहीं किया जा रहा है. अभी सरकार उन्हीं की है. भाजपा ने शिक्षा, सूचना और खुफ़िया तंत्र में अपने लोगों को बैठा रखा था. लेकिन इसे मैंने सोनिया गांधी से कहा नहीं क्योंकि वे फ़ैसला ले चुकी थीं और मेरे पास अपने संदेह का ठोस सबूत नहीं था.
सवाल-कहा जाता है कि राष्ट्रपति ने उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने में अपनी मज़बूरी जता दी थी. क्या इसमें कोई सच्चाई आपको लगती है?
जवाब-मुझे इसमें कोई सच्चाई नहीं लगती. इसका कोई सबूत भी नहीं है कि राष्ट्रपति ने इनकार कर दिया था. ऐसे मालमों में अक्सर मंशा पर बात अटका दी जाती है.
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विश्वनाथ प्रताप सिंह- मंज़िल से ज़्यादा सफ़र
लेखक- रामबहादुर राय
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
मूल्य-200 रुपए(पेपरबैक संस्करण) सजिल्द-600 रूपए, कुल पृष्ठ-536