पंकज प्रियदर्शी
बीबीसी संवाददाता, लंदन
वर्ष 2006 के पहले छह महीने बॉलीवुड के लिए रेगिस्तान में हरियाली की तरह रहे हैं. पिछले पाँच-छह वर्षों के दौरान बॉलीवुड अच्छी और सफल फ़िल्मों की घटती संख्या को लेकर चिंतित था.
लेकिन लगता है इस साल ने पिछले कुछ वर्षों की कमी पूरी कर दी है. इस साल के पहले छह महीने में बॉलीवुड खूब मालामाल हुआ है.
इतना ही नहीं अभी इस साल बड़े बैनर और बड़े सितारों की कई फ़िल्में रिलीज़ भी होने वाली है.
बॉक्स ऑफ़िस पर पैनी नज़र रखने वाले और फ़िल्म इन्फ़ार्मेशन पत्रिका के संपादक कोमल नाहटा भी इन छह महीनों में फ़िल्मों के प्रदर्शन को लाजवाब मानते हैं.
उनका कहना है कि छह महीने में इतनी सफल फ़िल्में बहुत कम आती हैं. कोमल कहते हैं कि 80 के दशक में कभी-कभी ऐसा होता था जब एक साथ कई सफल फ़िल्में आती थीं.
आँकड़ों पर नज़र डालें तो आमिर ख़ान की रंग दे बसंती से इस साल की ज़बरदस्त शुरुआत हुई. राकेश मेहरा की इस फ़िल्म ने ज़बरदस्त प्रशंसा बटोरी और बॉक्स ऑफ़िस पर धूम भी मचाई.
अच्छी शुरुआत
कोमल का मानना है कि रंग दे बसंती से हुई अच्छी शुरुआती अभी बनी हुई है. फ़ना और कृष ने इस सफलता में और चार चाँद लगा दिए हैं.
इस साल आमिर ख़ान की रंग दे बसंती और फ़ना के अलावा ऋतिक रोशन की कृष ने बॉक्स ऑफ़िस पर रिकॉर्ड कमाई की है. कोमल नाहटा के मुताबिक़ पिछले छह महीने की सबसे सफल फ़िल्म कृष है.
उनका आकलन है, "मेरे हिसाब से इस फ़िल्म ने अभी तक 40 करोड़ से ज़्यादा का व्यवसाय किया है. जबकि इस फ़िल्म के निर्माण में सिर्फ़ 25 करोड़ लगे थे और अभी भी फ़िल्म ख़ूब चल रही है."
कृष, फ़ना और रंग दे बसंती के अलावा जिस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर शानदार सफलता हासिल की, वो फ़िल्म थी फिर हेराफेरी.
सफलता
प्रियदर्शन की फ़िल्म हेराफेरी की अगली कड़ी फिर हेराफेरी के निर्देशक थे नीरज वोहरा. इस फ़िल्म ने दर्शकों का मनोरंजन तो किया ही, बॉक्स ऑफ़िस पर भी सफलता के झंडे गाड़े.
लेकिन इस फ़िल्म के साथ रिलीज़ हुई प्रियदर्शन की फ़िल्म चुप चुपके ने बड़ी सफलता तो हासिल नहीं की लेकिन निराश भी नहीं किया.
इन फ़िल्मों के अलावा जिन फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफ़िस पर कमाई की, वो थीं- मालामाल वीकली, गैंगस्टर, टैक्सी नंबर 9211, अक्सर, टॉम डिक एंड हैरी.
पिछले पाँच-छह वर्षों में हिट फ़िल्मों की घटती संख्या से निराश बॉलीवुड ने एकाएक क्या कर दिया, जिससे इंडस्ट्री की चमक लौट आई, कोमल कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों की नाकामी से निर्माता-निर्देशकों ने सबक सीखा है.
उन्होंने कहा, "निर्माता-निर्देशक अब ये समझ गए हैं कि सिर्फ़ स्टार लेने से बात नहीं बनेगी. जब तक कहानी पर, स्क्रीनप्ले पर मेहनत नहीं होगी. बात नहीं बन सकती. स्टार्स तो सोने पर सुहागा हो सकते हैं लेकिन सोना तो अच्छी कहानी और स्क्रीनप्ले है."
उन्होंने बताया कि वर्ष 2004 तक निर्माता-निर्देशक ये समझने लगे थे और 2005 की मेहनत अब रंग लाने लगी है.
इंतज़ार
अभी तक कई सफल फ़िल्मों के अलावा कई ऐसी फ़िल्में भी आईं, जिनसे अच्छे प्रदर्शन की अपेक्षा थी, लेकिन ये फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर औंधे मुँह गिरीं. इनमें प्रमुख थीं- डरना ज़रूरी है, फ़ैमिली, सावन, प्यारे मोहन, ज़िंदा और फ़ाइट क्लब.
कलाकारों के नज़रिए से देखें तो आमिर ख़ान की दो फ़िल्में रंग दे बसंती और फ़ना सुपरहिट रहीं. कोमल का कहना है कि आमिर के साथ-साथ अक्षय कुमार और ऋतिक रोशन ने दिखा दिया कि बॉक्स ऑफ़िस पर उनका जादू क़ायम है.
तो पहले छह महीने की सफलता ने बॉलीवुड को गदगद कर दिया है. लेकिन भई, बात इतनी ही नहीं है. अभी तो आने वाले समय में कई जानीं-मानीं फ़िल्में आ रही हैं और इनमें से कई फ़िल्मों पर तो बड़ा दाँव भी लगा है.
करण जौहर की कभी अलविदा ना कहना, यश चोपड़ा की धूम-2, विशाल भारद्वाज की ओंकारा, विधु विनोद चोपड़ा की लगे रहो मुन्ना भाई, फ़रहान अख़्तर की डॉन, साजिद नाडियाडवाला की जानेमन और जेपी दत्ता की उमराव जान पर लोगों की नज़रें टिकी हैं.
साथ ही टिकी है शाहरुख़ ख़ान, अभिषेक बच्चन, सलमान ख़ान, संजय दत्त, अक्षय कुमार, ऐश्वर्या रॉय जैसे कई सितारों की उम्मीदें भी.