गुरुवार, 13 जुलाई, 2006 को 20:46 GMT तक के समाचार
(बिंदास बाबू की डायरी)
मुंबई दहली. एक-दो-तीन-चार. ब्लास्ट-ब्लास्ट-ब्लास्ट. और फिर मुंबई संभली.
मुंबई तुझे सलाम. मुंबई तुझे नमन.
मीडिया ने दो दिन जो मुंबई बनाई वह इसी तरह थी. अभी ठंडी. अभी नरम. अभी गरम.
जब बम फट रहे थे तो मुंबई दहल रही थी. अगले दिन संभल गई. दुनिया का कोई शहर, कोई शहराती ऐसा नहीं होगा जो क्षण में दहल जाए और क्षण में संभल जाए.
मगर अपना कच्चा-पक्का इलैक्ट्रॉनिक मीडिया इसी तरह हर सुबह-शाम एक शहर बनाता और एक शहर बिगाड़ता है. शहर क्षण से बाहर भी होता है.
मगर एक बात के लिए मुंबई के लोगों को और देशभर के लोगों को नमन किया जाना ही चाहिए कि इतने भड़कावे में भी कोई नहीं भड़का.
यह हमारी जनता की वयस्कता है. मैच्योरिटी है कि वह ऐसी आफ़तों से विचलित नहीं होती.
तुलसी बाबा ने लिखा है.
'धीरज धर्म मित्र अरु नारी
आपत काल परखिए चारी.'
लोगों ने धीरज दिखाया. दलों ने दिखाया. नेताओं ने दिखाया.
किसी ने संकट का फ़ायदा उठाने की कोशिश नहीं की. यही सामाजिक उदात्तता का क्षण होता है. यही परीक्षा की घड़ी होती है.
जो हुआ उसे देख सुन किसे क्षोभ न होगा और उन वहशियों के लिए ज़रा सी भी हमदर्दी भला क्यों बचेगी जो निरपराध, अपने घरों को शाम को थककर लौटते हुए आदमी-औरतों को बम लगाकर ख़त्म कर डालते हैं.
वे दहशत फैलाकर जीते हैं. दहशत उनका शस्त्र है पर दहशत का शास्त्र कायर का शास्त्र है. बुज़दिल का है. समाजविरोधी का है.
कुछ कह सकते हैं कि उन लोगों की भी तकलीफ़ें हो सकती हैं. वे जब नहीं सुनी जातीं तो वे ऐसा करते हैं. लेकिन यह लाइसेंस उन्हें किसने दिया कि वे यूँ ही निरपराध लोगों को अचानक अपनी विध्वंसक बुद्धि से ध्वस्त कर दें.
ऐसे तत्वों की सिर्फ़ निंदा की जा सकती है. धिक्कारा जा सकता है. वे यह देख हैरत में होंगे कि जो दहशत वे फैलाना चाहते थे वह नहीं फैली. उतनी नहीं फैली. उनके मंसूबे फ़ेल हुए.
घृणा की संस्कृति लगातार फैलाई जा रही है. धार्मिक घृणा की संस्कृति ने दुनिया को बाँटा है. खून खराबा कराया है. घृणा की संस्कृति सहिष्णुता की संस्कृति से डरती है.
जैसे झटके पिछले वर्षों में भारतीय समाज को लगते रहे हैं उन्हें हँसते हुए सहन कर जाने को देख दुनिया चकित होती है. कारण है करुणा, सहिष्णुता, प्यार जो इस संस्कृति का सार है. यहाँ सबके लिए जगह है. कोई पराया नहीं है. यह बहुलतावादी समाज है.
इसी को देख कभी अल्लामा इक़बाल ने कहा था-
'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे ज़मां हमारा.'
तो हे पाठकों, मुंबई के दहलने-संभलने के इन दिनों में यह टिप्पणी इसी तरह की बन सकती थी.
आप रो नहीं सकते. क्षुब्ध होते हुए भी क्रोध नहीं कर सकते. सहने के लिए बुद्ध गाँधी जितनी करुणा चाहिए. करुणा की ज़रूरत है. आतंकवाद को सिर्फ़ करुणा पराजित कर सकती है. प्रति आतंकवाद नहीं.
(बिंदास बाबू की डायरी का यह पन्ना आपको कैसा लगा. लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर)