बुधवार, 28 जून, 2006 को 09:24 GMT तक के समाचार
अचला शर्मा
प्रमुख, बीबीसी हिंदी सेवा
भारतीय फ़िल्मों-धारावाहिकों में अंग्रेज़ किरदार के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाले अभिनेता टॉम ऑल्टर मानते हैं कि भले ही दिखने में वो अंग्रेज़ लगते हों पर हिंदुस्तान उनका घर है और वो ख़ुद एक देसी व्यक्ति हैं.
टॉम के मुताबिक भारतीय फ़िल्म जगत में शुरुआती दौर में उन्हें अपने अंग्रेज़ होने का लाभ मिला और इसे वो अपनी ख़ुशनसीबी मानते हैं.
उन्होंने इस बात से इनकार किया कि वो फ़िल्मों में एक तरह की ही भूमिका करते रहे. एक अंग्रेज़ किरदार के रूप में वो अपने फ़िल्मी कैरियर को विविधताओं से भरा हुआ पाते हैं.
टॉम ऑल्टर का जन्म भारत के उत्तरांचल राज्य के मसूरी शहर में हुआ. परवरिश-पढ़ाई-लिखाई सब भारत में. पुणे स्थित फ़िल्म संस्थान में भी गए और अभिनय को अपना कैरियर बनाया. टॉम कुछ समय तक रंगमंच से भी जुड़े और 'जुनून', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'मंगल पांडे' जैसी लगभग 200 फ़िल्में भी की हैं.
पिछले दिनों टॉम लंदन आए तो मैंने उनसे रंगमंच और फ़िल्म जगत से उनके जुड़ाव का अनुभव जानना चाहा और उनके निजी जीवन की भी टोह ली.
इस साक्षात्कार के कुछ प्रमुख अंश-
टॉम, सबसे पहले तो अमरीका से मसूरी आने की कहानी और एक कलाकार के रूप में अपने सफ़र की शुरुआत के बारे में बताएँ.
मेरा यहाँ आना मैने ख़ुद तय नहीं किया, मेरे माता-पिता ने तय किया था. मेरा जन्म मसूरी में हुआ. मेरे पिताजी और मेरे दादा-दादी वर्ष 1916 में अमरीका से हिन्दुस्तान आ गए थे. वे लोग पंजाब जाकर बसे. दादा पंजाब में ही पादरी थे. अभी जो पाकिस्तान है, पहले पंजाब था.
मेरे पिताजी की पैदाइश सियालकोट की है. इस तरह मैं तीसरी पीढ़ी हूँ और मेरे बच्चे चौथी. हिन्दुस्तान हमारा मुल्क ही नहीं बल्कि हमारा घर भी है.
मेरी माँ अमरीकी हैं. मेरे पिताजी कॉलेज की पढ़ाई के लिए अमरीका गए थे. वहां वो मेरी माँ से मिले, प्यार हुआ और अमरीका में ही शादी हो गई. शादी के बाद दोनों हिन्दुस्तान चले आए.
इतने बेहतरीन ढंग से आप हिन्दी और उर्दू बोलते हैं. कोई ख़ास वजह जो आपने उर्दू सीखी.
पिताजी पादरी थे. वो जहाँ सोते थे, वहाँ उनके पलंग के पास एक छोटी-सी मेज पर उर्दू भाषा में लिखी एक बाइबिल हमेशा पड़ी रहती थी. मैं अक्सर उसे देखता था और उसकी लिपि से मैं ख़ासा प्रभावित हुआ था.
जब मैं वर्ष 1972 में पुणे स्थित फ़िल्म संस्थान गया तब मैंने यह फैसला लिया कि फ़िल्मों में ही काम करूँगा और इसके लिए उर्दू जानना भी ज़रूरी था. वहीं पुणे में मेरे एक दोस्त थे मोहम्मद रफ़ीक. उन्हीं से मैंने उर्दू सीखना शुरू किया.
फ़िल्मों में आना क्या बहुत आसान था या मुश्किलों भरा रास्ता तय करना पड़ा.
वर्ष 1974 में टीवी का शुरूआती दौर चल रहा था. रंगमंच के बारे में मैने कभी सोचा ही नहीं था. मॉडलिंग भी उस दौर में कम चल रही थी. केवल फ़िल्में ही थीं.
'शाहबहादुर' फ़िल्म में देवानंद के साथ एक छोटा-सा मौक़ा मिला. सीन में देवानंद से इतना ही पूछना था कि कल हम कब मिल रहे हैं. देवानंदजी ने अपनी अंदाज़ में कहा कि हम कल सुबह नौ बजे मिलेंगे. वह सीन मेरे लिए इतनी बड़ी चीज़ थी कि मैं बयान नहीं कर सकता.
मैं थोड़ा ख़ुशनसीब था कि मेरा हुलिया अंग्रेज़ों वाला था. इसका शुरुआत में मुझे लाभ मिला. शुरू-शुरू में अंग्रेज़ों के रोल मुझे मिले. वर्ष 1976-1977 में सत्यजीत रे के साथ काम करने का मौक़ा मिला. 'शतरंज के खिलाड़ी' से भी सीखने का मौक़ा मिला. उसके बाद श्याम बेनेगल की 'जुनून' आई. 'शतरंज के खिलाड़ी' और 'जुनून' साथ-साथ आईं और इत्तफ़ाक से मैं दोनों में था.
इतनी सारी फ़िल्मों में काम करने के बाद क्या कभी आगे चलकर यह महसूस नहीं हुआ कि आपको धीरे-धीरे एक ही तरह के रोल में डाल दिया गया हो.
ऐसा हुआ ही नहीं बल्कि 'शतरंज के खिलाड़ी' और 'जुनून' जैसी फ़िल्मों में एक अंग्रेज़ किरदार के रूप में मुझे बड़ी भूमिकाएँ मिलीं. मेरे फ़िल्म कैरियर में एक अंग्रेज़ के तौर पर मुझे कमाल के रोल मिले. ऐसा कतई नहीं है कि मैं कहीं पीछे खड़ा हूँ.
आपकी सबसे पसंदीदा फ़िल्म कौन-सी थी.
एक फ़िल्म बनी थी 'चमेली मेम साहेब'. उसमें मैं अंग्रेज बना था और मैं हीरो का रोल अदा कर रहा था. मैं हीरो बनना चाहता था. राजेश खन्ना मेरे प्रेरणास्रोत थे और उस फ़िल्म में मैं अपने अंदाज़ में राजेश खन्ना बन पाया.
फिल्मों से बाहर निकल अब ज़रा रंगमंच की बात करें, यह सिलसिला कैसे शुरू हुआ.
हम लोग फ़िल्मों में काम करने के लिए आए थे. रंगमंच के बारे में सोचा भी नहीं था. वर्ष 1979 में मैं, नसीरूद्दीन शाह और बेंजामिन गिलानी, तीनों पुणे फ़िल्म संस्थान में थे. गिलानी मेरे साथ थे और नसीरुद्दीन एक वर्ष जूनियर थे.
हम तीनों ने मिलकर एक कंपनी क़ायम की और उसका नाम रखा- 'मोटली'. रंगमंच में मेरे लिए यह एक बहुत अच्छी शुरुआत रही. सबसे लोकप्रिय नाटक था 'वेटिंग फॉर गॉड्स'.
पिछले कुछ वर्षों से आप फिर से नाटक कर रहे हैं. ऐसा ही एक नाटक है 'मौलाना'. मौलाना आज़ाद पर आधारित इस नाटक के बारे में कुछ बताइए. जब आपके पास इसका प्रस्ताव आया होगा तो आपने क्या सोचा. कैसे राजी हुए.
इस नाटक के लेखक-निर्माता-निर्देशक हैं अलीगढ़ के डॉक्टर सईद आलम. मैं सच कहूँ, जब वो मेरे पास इस नाटक की पटकथा लेकर आए तो मैं दंग रह गया और मैंने उनसे कहा कि मैं ज़रूर काम करना चाहूँगा पर उन्होंने मुझे इसके लिए क्यों चुना, यह पूछने पर डॉ. आलम ने बताया कि वो मेरी फ़िल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' से प्रभावित हैं और यह फ़िल्म देखकर ही उन्होंने तय कर लिया था कि वो जब भी मौलाना आज़ाद पर नाटक करेंगे, अभिनय मुझसे ही कराएंगे.
यह तो क़रीब ढाई घंटे का नाटक है और आप अकेले किरदार हैं. आपको इस नाटक की पटकथा याद करना भी आसान काम नहीं लगा होगा.
याद करना आसान नहीं था लेकिन याद करने के बाद उन ख़्यालातों को एक ख़ूबसूरत अंदाज़ में पेश करना उससे भी मुश्किल था.
एक भारतीय होने के नाते भारत की कौन-सी बात आपको अच्छी लगती है और कौन-सी ख़राब.
मैं कोई गोरा नहीं बल्कि एक देसी आदमी हूँ. सबसे ज़्यादा अच्छी बात है यहाँ की धर्मनिपरेक्षता पर ग़रीबी का होना सबसे ख़राब लगता है.